परदेश

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परदेश

By |2018-04-17T22:56:33+00:00April 17th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

तुझको कैसे समझाउं,
झूठी आशा कैसे दिलाऊ,
कि मै किस भेष में हूँ,
तनहा परदेश में हूँ|

आया जब संदेशा उसका,
पढ़ ना पाया हाल उसका;
रुंधे गले से आवाज न निकली,
यांदों कि आगोश में हूँ;
क्यों कि मै परदेश में हूँ|

रो-रो के दिल अपना तुमने’
हल्का तो कर लिया होगा;
रो भी नहीं सका मै खुल के,
क्योंकि मै बे -होश में हूँ;
तनहा परदेश में हूँ|

कसक उठी मेरे मन में एक,
सपनों में पाया तुझको देख,
लौट कर भी आ नहीं सकता,
मै एक अंदेश में हूँ;
तनहा परदेश में हूँ|

ना कर मजबूर मेरी “जान”
कहना मेरा ले तू मान,
तू है परेशां वहां पे,
तो यहाँ खुश मै भी नहीं हूँ;
क्यों कि मै परदेश में हूँ|

सात समन्दर पार से,
एक दिन वापस आऊंगा;
खुशियाँ मिलकर बाटेंगे,
तब मै यह “राज “कहूँगा कि,
मै अपने देश में हूँ|

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About the Author:

हिंदी से स्नातक, नेटिव प्लेस जौनपुर उत्तरप्रदेश कविता, कहानी लिखने का शौक

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