एक पुलिसवाला हूँ
नोकरी करने वाली ,
एक लड़की का पति हूँ |
अाप बीती लिख रहा हूँ |
क्या गलत लिख रहा हूँ |
और तुम कहते हो मुझसे ,
मैं उदास कविताएँ क्यों लिख रहा हूँ …

रात,
लोगों के घर की निगरानी में बीत जाती है|
दिन,
अधिकारियों की हाजीरजवाबी में गुज़र जाता है|
एक तो कम्बख्त ,
घर जाने का कोई ठौर-ठिकाना नहीं
और जब भी जाता हूँ ,
पत्नी को ,
उसकी अपनी नोकरी की बात करते हुएे पाता हूँ|
जो हो रहा है ,
वही तो लिख रहा हूँ|
और तुम कहते हो मुझसे ,
मैं उदास कविताएँ क्यों लिख रहा हूँ …

पहले तो सुना था,
अब तो लगने लगा है|
शादी , बर्बादी हो जैसे|
ज़िन्दगी किसी अधुरी कहानी-सी
बेबस और आधी हो जैसे |
जो भूगत रहा हूँ ,
वही तो लिख रहा हूँ |
और तुम कहते हो मुझसे ,
मैं उदास कविताएँ क्यों लिख रहा हूँ …

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