है दूर तक फैली हुयी

स्वपन मरीचिका कि एक जाल है

जितने भी करू कोशिश

उलझी रहूँ हर बार मैं

 

सपनों के माया जाल है

है ये कैसा एक भवँर

तूफान के चक्रवात सा

उठता हो जैसे एक लहर

 

हर बार मन है भागता

मृगतृष्णा कि चाह में

बारम्बार खंडित होता

माया भ्रम के जाल में

 

कई बार रोकती पग को

कुछ अनकही सी बंदिशे

और शामिल है कभी

उनमें अपनों की रंजीशे

 

कतरती है मेरे पर को

उड़ने से मुझको रोकती

गिरती हूँ मैं धरा पर

परों को फिर समेटती

 

पर मन बड़ा है चंचल

दिन रात सपनें देखता

हर बार नए ढंग से

मरीचिका की जाल बुनता

 

फिर से रंगीन सपने

आँखों  में सजाती

कुमुदनी के भ्रमर सा

उसमे उलझती जाती..

 
लेखक / लेखिकाडॉ. वंदना मिश्रा

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