वक़्त है अभी भी

वो तोड़ रहे है हमारे होंसलों को
अभी टूटे तो बिखर जाएंगे
अभी तो वक़्त कदम उठाने का है
अगर रुके तो फिसल जाएंगे
मौन होना कोई समाधान नहीं है
सवाल और भी फिर उलझ जाएंगे
हमारे दिल में जो दहशत समायी है
उससे कैसे हम उबर पाएंगे
ये चुप्पी देश को खोखला कर देगी
फिर बाद में सब पछताएंगे
खुद पर बीतने का इन्तजार ना करो
ये मौके बार-बार फिर नहीं आएंगे
दर्द में किसी के अगर तुम हो खामोश,
तुम्हारे दर्द में लोग क्यों आगे आएंगे
अभी भी वक़्त है उठकर बोलो
नहीं तो स्वीकार करो
की
इससे भी बुरा समाज
हम खुद ही अपने हाथों से बनाएंगे

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माधुरी

प्राध्यापक(हिंदी साहित्य)

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