अस्तित्व

ना मोम की गुड़िया हूँ
ना ही खिलौना मिट्टी का
अस्तित्व है मेरा भी
क्यूँ मुझको सताते हो
क्यूँ मेरा अस्तित्व मिटाते हो
जीने का अधिकार है मुझको
क्यूँ मेरा जीवन कुचलते जाते हो
या गर्भ मे हो हत्या मेरी
या फिर हो बाहर
कभी निर्भया कभी आफिसा बनाते हो
क्यूँ गिरी इतनी मानसिकता
क्यूँ गिरे संस्कार है
इंसानियत हुई शर्म से तार तार है
मुझको भी जीने का अधिकार है
मुझको भी जीने का अधिकार है
 -शालिनी जैन

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