गुलाबी सलवार

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गुलाबी सलवार

By |2018-04-22T22:36:02+00:00April 22nd, 2018|Categories: कविता|Tags: , |0 Comments

रूक-रूक के चलती,चलते-चलते रूक रही है ।
आज माथे पर कोई नस दूख रही है ।

जिसको पकड़कर फांद लेता था मैं,
उसके घर की दीवार,
बबूल की वो डाल,
आज भी उसके घर पर झूक रही है ।
आज माथे पर कोई नस दूख रही है ।

अब भी अक्सर चौंक जाता हूँ मैं,
जब देखता हूँ कि –
उसके घर की छत्त पर,
कोई गुलाबी सलवार सुख रही है ।
आज माथे पर कोई नस दूख रही है ।

रूक-रूक के चलती,चलते-चलते रूक रही है ।
आज माथे पर कोई नस दूख रही है ।

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