चोर की पहचान

चोर की पहचान

By |2018-01-20T17:07:34+00:00February 9th, 2016|Categories: पंचतन्त्र|0 Comments

बहुत समय पहले किसी नगर में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नाम के दो दरिद्र मित्र रहते थे | एक दिन पापबुद्धि ने सोचा, मैं मूर्खता के कारण निर्धन हूँ, इसलिए धर्मबुद्धि को साथ लेकर दूसरे देशों में जाना चाहिए | वहां धन कमाकर सुख से रहना चाहिए |

यह सोचकर दूसरे दिन पापबुद्धि ने धर्मबुद्धि से कहा-“बूढ़े होने पर ऐसी कौन-सी बात होगी जिसको तुम याद किया करोगे ? अगर दूसरे देशों कि यात्रा नहीं करते, वहां नये अनुभव प्राप्त नहीं करते, तो अपने बच्चों को कौन से किस्से सुनाया करोगे ? पूर्वजों ने कहा है कि दूसरे देशों में भ्रमण करके जो व्यक्ति अनेक भाषाओँ और पोशाकों का ज्ञान नहीं कर पाता, उसका धरती पर जन्म लेना ही व्यर्थ है |”

पापबुद्धि की बातें सुनकर धर्मबुद्धि बड़ा प्रसन्न हुआ | बड़ो की आज्ञा लेकर वह मित्र के साथ दूसरे देशों को चल दिया | वहां पापबुद्धि ने धर्मबुद्धि के प्रभाव से बहुत धन कमाया | कुछ दिनों बाद वह पर्याप्त धन लेकर अपने देश लौट आए | अपने नगर के समीप एक वन में बैठकर दोनों ने विचार विमर्श किया | पापबुद्धि ने कहा-“मित्र, इतने धन को हमें अपने बंधु-बांधवों के बीच नहीं ले जाना चाहिए | इसे देखकर उन्हें ईर्ष्या होगी, वे किसी न किसी बहाने इसे हमसे छीनने का प्रयास करेंगे |”

पापबुद्धि की बात सुनकर धर्मबुद्धि ने कुछ सोचते हुए कहा-“बात तो तुम्हारी ठीक है | लेकिन यह धन हमने बड़ी मेहनत से कमाया है | अगर इसका उपयोग न करेंगे तो फिर इसे कमाने का क्या फायदा हुआ ?”

पापबुद्धि बोला-“मित्र, इस विषय में मैंने सोच लिया है | हम यह धन साथ नहीं ले चलेंगे | क्योंकि परिवार के लोग धन मांग-बाँट लेंगे | इसलिए जंगल में कहीं इस धन को गाड़ देना चाहिए | हमें थोड़ा-थोड़ा धन लेकर घर जाना चाहिए | बाकी जब जरुरत होगी, तब जंगल से इस गड़े धन को ले जाएँगे |”

धर्मबुद्धि मान गया | उन्होंने एक पेड़ के समीप जमीन में गड्ढा खोदा और अपना संचित धन उसमें गाड़कर अपने-अपने घर लौट गए |

अगले ही दिन पापबुद्धि रात को जंगल में गया और सारा धन खोदकर निकाल लाया और उसने वह धन अपने शर में छिपा दिया | फिर वह दो-तीन बाद धर्मबुद्धि के घर गया और उससे बोला-“मित्र, हम दोनों का परिवार बड़ा है | धन की आवश्यकता आ पड़ी है | चलो जंगल से थोड़ा धन निकाल कर ले आएं |”

धर्मबुद्धि उसकी बात मान गया | दोनों मित्र उसी स्थान पर पहुंचे | जब उन्होंने जमीन को खोदा तो वहां कुछ भी नहीं निकला | तूने यहाँ से सारा धन निकालकर मुझे धोखा दिया है | अगर तूने मेरे हिस्से का धन नहीं दिया, कतो मैं राज दरबार में शिकायत करूँगा |”

यह सुनकर धर्मबुद्धि बोला-“दुष्ट, चोर तो तुम हो | मैं ऐसा काम नहीं करता | मेरा नाम धर्मबुद्धि है | मैं चोरी नहीं करता |”

तब दोनों लड़ते-झगड़ते धर्माधिकारी के पास पहुंचे | दोनों ही एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे थे | पापबुद्धि बोला-“इस मामले में वन देवता से गवाही लेनी चाहिए | जिसको वे चोर और सज्जन बताएं, उसको वैसा ही मान लेना चाहिए |”

धर्माधिकारी पापबुद्धि की बातों से सहमत हो गया | उसने निर्णय दिया कि कल प्रातःकाल धर्मबुद्धि और पापबुद्धि के साथ वह स्वयं घटनास्थल पर जाकर देखेगा और वृक्ष देवता की गवाही के अनुसार अपना निर्णय देगा |

न्यायलय  से वापस आकर पापबुद्धि ने अपने पिता से कहा-“पिताजी, मैंने धर्मबुद्धि के बहुत से धन अपहरण कर लिया है | अगर आप मेरे पक्ष में गवाही दें तो मेरे प्राण और धन, दोनों ही बच जाएँगे |

पापबुद्धि का पिता पुत्र मोह में उसकी सहायता को तैयार हो गया | पापबुद्धि ने उसे अपनी योजना समझा दी | योजनानुसार उसका पिता वृक्ष के एक कोटर में जाकर बैठ गया |”

दूसरे दिन प्रातःकाल धर्माधिकारी, पापबुद्धि और धर्मबुद्धि को लेकर उस जगह पर पहुंचे, जहाँ दोनों ने धन गाड़ा हुआ था | वहां पहुँच कर पापबुद्धि ने घोषणा की-“समस्त देवगण मनुष्य के कर्मों के साक्षी हैं | हे वन देवता! हम दोनों में से चोर है आप उसका नाम लेकर बता दीजिए |”

वृक्ष की कोटर में छिपे पापबुद्धि के पिता ने यह सुनकर कहा-“सज्जनों, ध्यानपूर्वक सुनो | उस धन को धर्मबुद्धि ने चुराया है |”

यह सुनकर धर्माधिकारी तथा राजपुरुषों को बड़ा आश्चर्य हुआ | वे अभी अपने धर्मोंग्रंथों को देखकर निर्णय देने की तैयारी ही कर रहे थे कि धर्मबुद्धि ने उस वृक्ष को आग लगा दी, जहाँ से वह आवाज आई थी | आग लगते ही कुछ देर में पापबुद्धि का पिता आग से झुलसा चिल्लाता हुआ वृक्ष की कोटर में से निकला | उसे इस हालत में देख सभी को अचंभा होने लगा | तब न्यायाधीश ने उससे पूछा-“महाशय! आप कौन हैं और आपकी यह दशा कैसे हुई ?”

पापबुद्धि के पिता ने धर्माधिकारी के सामने सारी घटना ज्यों की त्यों कह सुनाई | तब सच्चाई जान कर धर्माधिकारी ने जो सजा धर्मबुद्धि के लिए नियुक्त की थी, वह पापबुद्धि पर लागू कर उसे उसी वृक्ष पर लटकवा दिया और धर्मबुद्धि की चारों और प्रशंसा होने लगी |

इसीलिए कहते हैं कि उपाय पर विचार हुए अपाय की अपेक्षा नहीं करना चाहिए | पापबुद्धि ने अपाय के बारे में कुछ नहीं सोचा, इसीलिए उसे भोगना पड़ा |

फिर करटक ने दमनक से कहा-“अरे मूर्ख, तूने भी पापबुद्धि की ही तरह काम किया है | तुमने अपने स्वामी पिंगलक के प्राण संकट में दाल दिए हैं | तुम सचमुच दुष्ट एवं कुटिल हो | अगर तुम अपने स्वामी को मरवा सकते हो, फिर मेरे जैसे लोगों का क्या होगा ? अब तेरे पास रहना ठीक नहीं |”

जब करटक और दमनक के बीच इस प्रकार का वार्तालाप चल रहा था तो इस बीच पिंगलक और संजीवक के मध्य जीवन और मौत का संघर्ष चल रहा था | अंत में पिंगलक ने अपने नाखूनों और दांतों की सहायता से संजीवक को मौत के घाट उतार दिया |

संजीवक को मारकर पिंगलक मन-ही-मन कहने लगा-“संजीवक का वध करके मैंने बहुत बड़ा पाप किया है, क्योंकि विश्वासघात से बढ़कर कोई दूसरा पाप नहीं होता | मैं पहले अपनी सभा में उसकी प्रशंसा किया करता था, अब मैं सभासदों को क्या समझाऊंगा |”

पिंगलक की यह दशा भांपकर दमनक उसके पास पहुंचा और बोला-“स्वामी! घास खाने वाले बैल का वध करने के बाद आप इतना शोक क्यों मना रहे हैं ? आपकी यह नीति बड़ी कतार है | राजाओं के लिए यह अनुचित है | यह बैल तो आपसे द्रोह करता था | चाहे पिता हो या भाई, पुत्र हो या पत्नी, यदि वे प्राण लेने का प्रयत्न करें तो उनका वध करने में कोई पाप नहीं होता |”

इस प्रकार दमनक के बहुविधि समझाने पर पिंगलक ने संजीवक की मृत्यु का शोक करना छोड़ दिया और दमनक को अपना मंत्री बनाकर पूर्ववत अपना राज्य संचालन करने लगा |

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