लोभ का परिणाम

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लोभ का परिणाम

By |2018-01-20T17:07:33+00:00February 9th, 2016|Categories: पंचतन्त्र|0 Comments

दक्षिण के किसी जनपद में महिलारोप्य नामक एक नगर था | उस नगर में थोड़ी दूर पर बरगद का एक विशाल वृक्ष था | उस वृक्ष पर अनेक पक्षी अपना घोंसला बनाकर रहते थे | वृक्ष के कोटरों में अनेक छोटे-छोटे जीव-जंतु रहते थे | दूर से आने वाले थके-हारे यात्री उस वृक्ष की छाया में विश्राम करते थे|

उसी वृक्ष पर लघुपतनक नाम का एक कौआ भी रहता था | एक बार वह भोजन की तलाश में नगर की ओर उड़कर जा रहा था | उसने रास्ते में एक ऐसा व्यक्ति देखा जो यमदूत की तरह डरावना था | वह हाथ में जाल लिए उसी बरगद के वृक्ष की ओर जा रहा था | कौए ने सोचा कि यह वधिक निश्चय ही जाल फेंक कर और चावलों के दाने बिखेरकर इस पेड़ के पक्षियों का शिकार करेगा | यह सोचकर लघुपतनक नाम का वह कौआ बरगद के वृक्ष पर वापस लौट आया | उसने सब पक्षियों को शिकारी, जाल और चावलों के बारे में सावधान कर दिया |

लघुपतनक अपने साथी पक्षियों को यह समझा ही रहा था कि शिकारी ने बरगद के वृक्ष के नीचे आकर चावल के दाने बिखेरे और उनके जाल बिछा कर एक ओर झाड़ी के पीछे छुप गया | बरगद के वृक्ष के पक्षियों ने लघुपतनक की बात याद राखी इसलिए वे चावल के दानों के लालच में नहीं आए | वे उन दानों को विष की तरह मानते रहे | लेकिन तभी इसी बीच शिकारी के सौभाग्य से कबूतरों के साथ उड़ता हुआ चित्रग्रीव नामक कबूतरों का मुखिया वहां आया | लघुपतनक के बहुत समझाने पर भी वह भूमि पर भिखरे हुए चावलों के दानों के लालच में आकर जाल में फंस गए | लोभ का यही परिनाम होता है | लोभ से विवेक शक्ति नष्ट हो जाती है |

जाल में फसने के बाद कबूतरों के मुखिया चित्रग्रीव ने अपने साथियों को समझा दिया कि वे अब अधिक फड़फड़ाने या उड़ने की कोशिश न करे, नहीं तो शिकारी उन्हें मार देगा | इसीलिए वे सब अधमरे से हुए जाल में बैठ रहे | शिकारी उन्हें शांत देखकर मारा नहीं | जाल समेट कर वह आगे चल पड़ा | चित्रग्रीव ने जब देखा कि शिकारी निश्चित हो  गया है और उसका ध्यान दूसरी ओर हो गया है, तभी उसने अपने साथियों को जाल समेत उड़ जाने का संकेत किया | संकेत पाते ही सब कबूतर जाल लेकर उड़ गए | लघुपतनक भी उनके पीछे-पीछे उड़ने लगा |

जाल समेत कबूतरों को उड़ता देख शिकारी को बड़ी निराशा हुई | उसने कुछ दूर तक तो उनका पीछा किया अंत में थकहार कर वह वहीँ बैठ गया | जब चित्रग्रीव ने देखा कि अब शिकारी का डर नहीं है तो उसने अपने साथी कबूतरों से कहा-“शिकारी तो लौट गया | अब चिंता की कोई बात नहीं है | चलो, हम महिलारोप्य शहर के पूर्वोतर भाग की ओर चलें वहां मेरा घनिष्ट मित्र हिरण्यक नाम का चूहा रहता है | उससे हम अपने जाल को कटवा लेंगे | तभी हम आकाश में स्वच्छंद घूम सकेंगे |”

यह कहकर चित्रग्रीव अपने साथियों सहित हिरण्यक के बिल के द्वार पर उतर गया और जोर से आवाज लगाई-“मित्र हिरण्यक! शीघ्र बाहर आओ | मुझ पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा है |”

उसकी आवाज सुनकर हिरण्यक ने अपने ही बिल में छिपे-छिपे पूछा-“तुम कौन है ? कहाँ से आये हो ? क्या प्रयोजन है ?”

चित्रग्रीव ने कहा-“मित्र, मैं कबूतरों का मुखिया चित्रग्रीव हूँ | जल्दी आओ, तुमसे बहुत जरुरी काम है |”

यह सुनकर हिरण्यक प्रसन्न मन से बिना किसी भय के बिल के बाहर आया | उसने चित्रग्रीव से पूछा-“यह सब क्या हो गया मित्र ?”

चित्रग्रीव बोला-“मित्र, जानते हुए भी पूछ रहे हो ? जीभ के स्वाद के लालच में हम इस जाल में फस गए हैं | अब तुम शीघ्र ही इस बंधन कटवाना |”

चित्रग्रीव ने कहा-“मित्र, ऐसी बात मत कहो! ये सब कबूतर मेरे आश्रय में हैं | मेरे ही साथ अपना परिवार छोड़कर आए हैं | यह कैसे हो सकता है कि इनका आदर मैं न करू ? अगर पहले मेरे बंधन काटने हुए तुम्हारा दांत टूट गया, और इस बीच शिकारी भी आ गया तो मैं नरक में जाऊंगा |”

यह सुनकर हिरण्यक बड़ा प्रसन्न हुआ उसने कहा-“मित्र मुझे भी राजधर्म का पता है | मैं तो तुम्हारी परीक्षा ले रहा था |” यह सुनकर हिरण्यक ने जाल काट कर चित्रग्रीव सहित सभी कबूतरों को बंधन-मुक्त कर दिया | फिर उसने चित्रग्रीव से कहा-“मित्र, अब अपने साथियों सहित घर जाओ | विपत्ति के समय मुझे फिर याद करना |”

चित्रग्रीव अपने साथियों के समय घर की और उड़ चला और हिरण्यक अपने बिल में घुस गया | लागुपतनक नाम का वह कौआ जो कबूतरों का पीछा करता हुआ वहां पहुँच गे था, एक पेड़ की डाल पर बैठा यह सब देख-सुन रहा था | वह हिरण्यक के कौशल और उसकी सज्जनता पर मुग्ध हो गया | उसने मन-हीमन सोचा, यधपि मेरा स्वभाव है कि मैं किसी का विश्वाश नहीं करता, किसी को अपना हितैषी नहीं मानता, तथापि इस चूहे के गुणों से प्रभावित होकर में इसे अपना मित्र क्यों न बना लूं ?

यह सोचकर वह उसके बिल के द्वार पर गया और उसे पुकारा-“हिरण्यक! बाहर आओ |”

यह सुनकर हिरण्यक ने सोचा कि शायद कोई कबूतर बंधन मुक्त होने से रह गया है | इसलिए उसने कहा-“तुम कौन हो ?”

कौए ने कहा-“मैं लघुपतनक नाम का कौआ हूँ |”

हिरण्यक ने बिल के अन्दर से ही कहा-“मैं तुमसे नहीं मिलना चाहता |”

कौआ बोला-“भाई, मैंने तुमको चित्रग्रीव और उसके साथियों को बंधन मुक्त करते हुए देखा है | इसी प्रकार तुम मेरी भी सहायता कर सकते हो | मैं तुम्हारे साथ मित्रता करना चाहता हूँ |”

हिरण्यक बोला-“नहीं भाई, तुम भक्षक हो, मैं तुम्हारा भोजन हूँ | हमारी तुम्हारी मित्रता संभव नहीं है |”

कौआ बोला-“अगर तुम मेरे साथ मित्रता नहीं तो मैं तुम्हारे इस बिल के द्वार पर अपनी जान दे दूँगा | मेरा और तुम्हारा चाहे पहले कभी सम्बन्ध नहीं रहा, मगर बैर भी कैसे हो सकता है |”

कौए ने कहा-“मुझे दोनों प्रकार के शत्रुता के लक्षण बताओ |”

हिरण्यक बोला-“जो बैर कारण से हो वह कृत्रिम होता है, कारणों से ही उस बैर का अंत भी होता है |  स्वाभाविक बैर निष्कारण होता है, उसका अंत हो ही नहीं सकता |”

लघुपतनक ने बहुत अनुरोध किया, लेकिन हिरण्यक ने मैत्री के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया | तब लाघुपतनक ने कहा-“यदि तुम्हें मुझ पर विश्वास न हो तो तुम अपने बिल में छिपे रहो, मैं बिल बाहर बैठा-बैठा ही तुमसे बातें कर लिया करूँगा |”

हिरण्यक ने लघुपतनक को सच्चा और विद्वान मानकर उसकी बात मान ली और कहा-“ठीक है, हम इसी तरह मिला करेंगे | लेकिन ध्यान रखना कभी मेरे बिल में प्रवेश करने की चेष्टा मत करना |”

लघुपतनक इस बात को मान गया | उसने शपथ ली कि कभी वह ऐसा नहीं करेगा | तब से वे दोनों मित्र बन गए | धीरे-धीरे उनकी मित्रता बढती गई और फिर एक ऐसी स्थिति आ पहुंची जब उन्हें एक-दूसरे को देखे बिना चैन नहीं पड़ता था |

एक दिन लघुपतनक ने दुःखी स्वर में हिरण्यक से कहा-“मित्र, अब मैं इस देश को छोड़ना चाहता हूँ | वर्षा न होने के कारण यहाँ सूखा और अकाल पड़ गया है | लोग भूखों मर रहे हैं | भूखे लोग पक्षियों को जाल में फंसा रहे हैं | मैं किसी तरह बच गया हूँ | ऐसे में रहना ठीक नहीं |”

यह सुनकर हिरण्यक बोला-“कहाँ जाओगे मित्र ?”

लघुपतनक बोला-“दक्षिण दिशा की और एक वन में एक बहुत बड़ा सरोवर है | वहां मंथरक नाम का मेरा मित्र कछुआ रहता है | उसके सहयोग से मुझे पेट भरने योग्य अन्न-मांस आदि अवश्य मिल जायेगा |”

हिरण्यक ने कहा-“मित्र, अगर ऐसी बात है तो मैं भी तुम्हारे साथ जाऊंगा | मैं भी यहाँ दुःखी हूँ |”

कौए ने पूछा-“तुम्हें क्या दुःख है मित्र ?”

हिरण्यक बोला-“इस विषय में बहुत-सी बातें करनी हैं | वहीं चलकर बताऊंगा |”

लघुपतनक ने कहा-“लेकिन मित्र, मैं तो आकाश मार्ग से उड़ कर जाऊंगा | तुम मेरे साथ कैसे जाओगे ?”

हिरण्यक बोला-“मित्र तुम मुझे अपनी पीठ पर बिठा कर ले चलो |”

यह सुनकर लघुपतनक बड़ा प्रसन्न हुआ | उसने हिरण्यक को अपनी पीठ पर बिठाया और उसे लेकर उस सरोवर की और उड़ चला जहाँ उसका मित्र मंथरक रहता था | मंथरक ने दूर से ही देख लिया था कि कोई कौआ चूहे को पीठ पर बिठा कर आ रहा है तो वह डर के मारे पानी के अन्दर घुस गया | लघुपतनक को उसे पहचाना नहीं |

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