सब याद है……

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सब याद है……

25.07.2013 को मैंने अपनी बिड़ला स्कूल, पिलानी (1974 से 1980) से जुड़ी यादों को कुछ पंक्तियों में समेटा था, आज आप सब के साथ साँझा कर रहा हूँ…….

“सब याद हैं…”

पिलानी हॉस्टल के सुहाने दिन सब याद हैं…

स्कूल से छुट्टी ले कर दोस्तों के रूम से लड्डू चुराना
खाली डिब्बा उन्हें दिखा कर फिर जोर से खिलखिलाना,
भाग कर फिल्में देखना “डिब्बा” सिनेमा-हॉल में रात को
हॉस्टल से हम ऐसे निकलते थे जैसे चोरों की बारात हो.

पिलानी हॉस्टल के सुहाने दिन सब याद हैं….

सुबह-सुबह खारा सर की वो बेरहम पी टी
मैस के पीछे वो बर्तन मांजता, झीखता “टी सी”,
सन्डे की वो धूप में घंटों लॉन में बैठ कर तेल की मालिश
स्कूल यूनिफार्म के काले जूतों पर वो चेरी-ब्लॉसम की पॉलिश.

पिलानी हॉस्टल के सुहाने दिन सब याद हैं ……

पांचवीं कक्षा में छोटी फील्ड में वो बेसबॉल का खेल
छटी कक्षा में अटेंडेंट मदन जी और वार्डन ताऊ जी की रेलम पेल,
सातवीं कक्षा की डोरमेट्री में अटेंडेंट बजरंग जी की डाकू की कहानी
आठवीं कक्षा के हॉस्टल-रूम में वो खेल-खेल में “लम्बी घोड़ी” बनानी.

पिलानी हॉस्टल के सुहाने दिन सब याद हैं ….

बिड़ला पब्लिक स्कूल के लड़कों की मज़ाक उड़ाना
उनको हर खेल में उनके ही मैदान में खूब हराना,
धीरे से अध्यापकों को उनके मज़ाकिया उप नाम से पुकारना
उनके पलट कर देखने पर फिर उनसे ही नज़रें चुराना.

पिलानी हॉस्टल के सुहाने दिन सब याद हैं …….

प्रत्येक सन्डे को बिट्स ऑडी में वह नई-नई फिल्में देखना
इंटरवल में ऊपर बालकनी में बैठे सुन्दर चेहरों को ताकना,
पूरे सप्ताह फिर उस फिल्म के गाने बाथ-रूम में गुन-गुनाना
बाथ-रूम के बाहर इंतज़ार कर रहे साथी को बड़ा सा मुक्का दिखाना

पिलानी हॉस्टल के सुहाने दिन सब याद हैं ……

घर से आयी माँ की चिट्ठी को बार-बार पढ़ना
कोई और ना पढ़ ले, बुझे मन से उसे फाड़ना,
अकेले में माँ को याद करके वो चुपके से रोना
जा कर वाश-बेसिन में फिर थोबड़े को धोना.

पिलानी हॉस्टल के सुहाने दिन सब याद हैं ……

घर से राखी ना आने पर वो खुद उदास हो जाना
दोस्तों की बहनों से फिर हंस कर राखी बंधवाना,
घर को याद करके रो रहे दोस्तों को खूब हँसाना
खुद भी भीगी आँखों से फिर धीरे से मुस्कुराना.

पिलानी हॉस्टल के सुहाने दिन सब याद हैं …….

नरेन्द्र ‘नरेन’ 25.7.2013

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सरकारी नौकरी में हूं एव समय मिलने पर तुकबंदी कर लेता हूं।

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