जीवन – जाच

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* मेरी मातृभाषा पंजाबी व राष्ट्रभाषा हिन्दी है ; मैं दोनों भाषाओं में लिखता हूँ । प्रस्तुत कविता पंजाबी भाषा और देवनागरी लिपि में है ।*

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जीवन – जाच
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( इक )

ओ जीवण जोगयो
कंन धर के सुण लओ उसदी
जेहड़ा हड्डीं हंढाई सुणावे
मन विच लै के आस मिलण दी
जद कोई गली यार दी जावे
तली पैर दी धरत न चुंमें
न सिर ते जटा सजावे
पिंडे भसम न मल्ली होवे
न कोई कंन पड़वावे
ठूठा हत्थ न फड़या होवे
न कोई भेख बणावे
लै – लै लिल्लकां हाड़े कढ्ढे
लक्ख कोई तरले पावे
बूहे अग्गे कोई खड़न नहीं दिंदा
न कोई भिछया पावे
सब कौतक मैं करके थक्कया
नहीं बोलदे मिट्टी दे बावे . . . . .

करम जे होवण बहुत ही खोटे
दिल हो जावे टोटे – टोटे
रातां हो जावण लंमियाँ
दिन रह जावण बहुत ही छोटे
नहीं बोलदे मिट्टी दे बावे . . . . . !

वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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