माँ भारती के भव्य प्रांगण में ।

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माँ भारती के भव्य प्रांगण में ।

जाते जाते अंग्रेज दिखा गए,
अपनी बुद्धि का कमाल;
अंग्रेजी और अंग्रेजियत को,
दिए हमारे सर पर डाल |
 
दिखाया अंग्रेजी ने हम पर,
अजीब ढंग से चमत्कार ;
भद्दी लगने लगी स्वभाषा ,
अर्थहीन हो गए सारे आचार |
न बन पायी थी कभी अंग्रेजी ,
जन – जन      का    कंठहार ,
पर बात हुई क्या आज?
रही यह इतनी जड़ें कैसे पसार?
अंग्रेज थे यहाँ तब थी अंग्रेजी,
 की संकरी सरिता सी |
बाद सात दशक हो गयी वह,
पावस की पागल सरिता  सी।
और हम हैं कि अंग्रेजी के लिए ,
दण्ड धर कर  हैं   तैयार
करा रहे दुर्बल कन्धों पर
बलात्  अंग्रेजी  सवार |
 
ढो नहीं पा रहे बेचारे,
भाषा का दुसह्य भार।
कहीं दुबक कर सुबक रहें हैं,
खाकर अंग्रेजी की मार |
 
कल्पांत के जलप्लावन  से छा रहे,
देश में आंग्ल विद्यालय आज;
या  संस्कृति लीलने आ रहा देश में,
मानो कोई महाप्रलय  आज |
 
अंग्रेजों के संग  अंग्रेजी की ,
हुई   क्यों  न  विदाई  थी ?
स्वभाषा के मूल्य पर हमने,
क्यों इसको शीश लगाई थी?
 
माना स्वामी की भाषा पर ,
होती है सेवक की आसक्ति;
अर्ध सदी के बाद हाय! यह,
यह कैसी  अद् भूत स्वामीभक्ति ?
 
नगरों में तो अंग्रेजी के,
लगा प्रबलता का रोग;
देहातों में भी कम नहीं होते,
इसके शब्दों का उपयोग |
 
वहाँ भी माएँ कहलाती हैं – ‘मोम’
पिता – ‘डैड ‘ बनकर हैं निहाल
रुग्ण संस्कृति का प्रतिफल है यह
या है, अंग्रेजियत का मायाजाल |
 
अंग्रेज़ी जिसकी भाषा है,
वे करें इसकी बोलचाल
हमें किन्तु, अपनी अस्मिता का,
रखना होगा तनिक खयाल|
                   –  सुबल चन्द्र राय ‘सुधाकर’
                       subal.sudhakar@gmail.com
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