माँ तो माँ होती है

माँ तो माँ होती है

माँ तो बस माँ ही होती है,
क्या सगी, क्या सौतेली.
मगर यह समझता है कौन,
वह है एक अनबुझ पहेली.

कैसा है यह आधुनिक समाज,
बदला  है  बेशक रहने का सलीका.
मगर  विचारों  से  ना बदला समाज,
है वही  संकुचित सोच, वही तरीका.

माँ ही तो होती है वह भी,
जो प्रतिपल संतान की फ़िक्र करती है,
त्याग, तपस्या की मूर्ति बन,
जो  बस  संतान के लिए  जीती  है .

लेकिन उसके प्रेम और बलिदान को,
जग में समझता है कौन?
काँटों का ताज पहनकर सर पर,
अंगारों पर चलती है रहकर, मौन.

वह पुरे करती है अपने सारे फ़र्ज़,
और उठाती है ज़िम्मेवारियों का बोझ.
मगर इसके बदले पाती है उपेक्षा, अपमान,
और समझी जाती है स्वजनों पर बोझ.

क्रोध और नाराज़गी को बयान करे कैसे,
यदि करे तो बदनाम हो जाये.
ऐसी ही होती है सौतेली माँ… ताना वह सुने,
उसे ज़माने भर के कटाक्ष सुनाये जाए.

उसकी डांट -फटकार ,नाराज़गी के परोक्ष में ,
छुपी होती है सगी माँ सी ही संतान के लिए भलाई .
जन्म नहीं दिया अपने गर्भ से तो क्या,
संतान के दिल से तार से तार तो है उसने मिलायी .

उसके अरमानो और सपनो का,
केंद्र-बिंदु होती है उसकी संतान.
हर माँ की तरह अपनी ख़ुशी और प्यार,
उनपर लुटाना  चाहती है  यह  माँ .

सौतेली माँ जितनी भी हो सुशील,
संस्कारी ,सुशिक्षित और गुणवान .
मगर है तो वोह कोल्हू बैल, निर्गुणी,
और सबके लिए प्राणी एक अनजान .

हां प्रभु! हां प्रभु! कैसा लिखा  तूने  भाग्य ! ,
सौतेली  माँ  का तमगा पहनाया , नहीं दिया  सौभाग्य .
कान्हा  जैसी  सन्तान देकर इसको  भी काश !
प्रदान करते  माता यशोदा  जैसा   सौभाग्य .

मैं भी सारी उम्र तेरा  गुणगान  करती ,
तुमसे  वरदान रूप में मिली संतान पाकर ,
मैं भी  निहाल हो जाती .
जीवन सफल हो जाता मेरा ,
मेरी सारी  तपस्या भी सफल हो जाती ,
यदि  मेरी  संतान  मुझे  बस एक बार,
”माँ ”  कहकर   संबोधित करती .

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संक्षिप्त परिचय नाम -- सौ .ओनिका सेतिया "अनु' , शिक्षा -- स्नातकोत्तर विधा -- ग़ज़ल, कविता, मुक्तक , शेर , लघु-कथा , कहानी , भजन, गीत , लेख , परिचर्चा , आदि।

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