अब भी रोज बुनता हूँ सपने
अपने ही
किसी सुखद भविष्य की नहीं,
बुहार कर
कंकणों को
देने के लिए
कुछ स्वच्छ, सीधी, सपाट सड़क
अपनी जिम्मेदारियों को।
अब भी रोज चुनता हूँ कलियाँ
सजाने के लिए
प्रेयसी के घने अलकों में नहीं,
देने के लिए
एक छोटी निश्छल मुस्कान
अपने नन्हें भगवानों को
जिनकी हँसी, खुशी, और दुनिया
निर्मित की है
मैंने ही
अपने रक्त से।
अब भी रोज विद्रोह करता हूँ
छिन्न-भिन्न करने के लिए
कुंठित मान्यताओं को
एकनिष्ठ चली आ रही सत्ताओं का नहीं,
अपने अंतर के द्वंद्वों से
मन से जुड़े संबंधों से
जो कभी छद्म दिखते हैं
मेरी हानि ही लिखते हैं,
साथ ही
नोच डालना चाहता हूँ
दिखावे में उड़ने वाले पंख को
जिससे बनाऊँ एक साधन
और बुहारूं
कंकणों को
देने के लिए
कुछ स्वच्छ, सीधी, सपाट सड़क
अपनी जिम्मेदारियों को।

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