मैं बियाबान में भी

लेकर चलता हूँ

अपना परिवार

गाँव अपना

शहर और देश के साथ ही

दुनिया अपनी

आदमी होने के नाते।

और तुम भीड़ में भी

अपने में सिमटकर

तोड़ते हो परिवार

उजाड़ते हो गाँव

जलाते हो शहर और देश

किसी और दुनिया के लिए

आदमी होने के नाते।

मैं हार जाता हूँ

अकेले होने के कारण

तुम बाजी मार जाते हो

पूरी तरह तैयार होने के कारण

हथियारों के साथ।

तब समझ में आता कि

बड़ा कमजोर है आदमी

अपने द्वारा निर्मित हथियारों से भी

आदमी होने के कारण।

या कि तुम आदमी हो ही नहीं?

जानवर हो सर्कस के

इशारे पर करतब दिखाने वाला जानवर!

जिसकी अपनी तो कोई सोच ही नहीं

जिसका आदमी मर गया है

या कि डर गया है ,

और मैं डरा रहा हूँ

आदमी होने के नाते।

¨¨

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