बिना सही तरीके से किसी बात को, किसी के विचारों या किसी के बारे में समझे बिना खुद से किसी निष्कर्ष पर पहुच जाना कितना सही है। हम लाख सही हों लेकिन सामने वाले के विचारों को भी एक बार समझना चाहिए किसी भी निर्णय तक पहुचने से पहले, कि सामने वाला कहना क्या चाहता है ? ये बात मैं इस लिए कह रहा हूँ क्योंकि कुछ लोगों का मानना है कि एक लेखक जब कुछ भी लिखता है उस वक्त वह उसी स्थिति में होता है जैसे कि जब लेखक खुशी के अल्फाज़ लिखे तो वह खुश है या कोई दर्द भरे शब्द लिख रहा है तो वह बहुत ज्यादा दुखी ही है।
मेरे विचारों से ये पूर्ण सत्य नही है जब कोई रचनाकार कुछ लिखता है तो ज्यादातर समाज मे देखी जाने वाली स्थितियों और परिस्थितियों को अपने शब्दों में लिखता है तो उन अल्फाजों में वेदना, भाव और अहसासों का सामंजस्य होता है जिस बात को वो लिख रहा होता है ये कह सकते हो लेखक ने उसे समाज में महसूस किया होगा न कि वह खुद उस स्थिति से गुजरा होगा या गुजर रहा होगा।
हाँ कुछ वक्त ऐसा भी होता है जब लेखक अपने बारे में लिखता है उस वक़्त लेखक जो लिखता है वह उसी स्थिति में होता है। ये सत्य है कि अगर जिस इंसान में वेदना पढ़ने, समझने और महसूस करने की काबलियत न होगी वो रचनाकार/लेखक नहीं हो सकता। क्योंकि रचना करने के लिए दिल में वेदना और भावनाओं को समझने का ज्ञान होना जरूरी है। इसी तरह जब तक पढ़ने वाले के दिल में भावनाओं को समझने की छमता न होगी तब तक पढ़ने वाले को लेख में सिर्फ चंद्र अल्फाज नजर आयेंगे। उन लिखे अल्फाजों की कीमत पता नही चलेगी।

-सुभाष

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