आधार

। । ओ३म् । ।

* * * आधार * * *

कहाँ गए थे
कहाँ से आए हैं
क्या पिये हैं
क्या कुछ खाये हैं
नाप रहे सड़कें कि
कुछ व्यापार जमाये हैं
कपड़े तो बदले नहीं
बाल बढ़ाये हैं
फटी जेब वाले कितने
कुर्ते सिलवाये हैं
घर की छोड़ो
बाहर कितने दबाये हैं
भूखे नंगे हैं कि
भूखों को खिलाये हैं
पूछ नहीं रहे तुमसे
न हम बौराये हैं
आधार के बीच से
जो छेद कराये हैं
बड़के भैया नज़रें
तुम पर टिकाये हैं
और , उनके पीछे
जो चाचा मुस्काये हैं
पाताललोक के चौधरी
भूमंडल के थानेदार
शेष सभी आधारहीन
केवल इनका है आधार !

– वेदप्रकाश लाम्बा
९४६६०-१७३१२

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