कौन अरे !!

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कौन अरे !!

(यह प्रसंग मैं अपने ऐतिहासिक महाकाव्य “जय मालव” से उदधृत कर रहा हूँ। चौथी सदी ईसा पूर्व के सिकन्दर के भारत आक्रमण की पृष्ठभूमि पर आधारित इस महाकाव्य के प्रस्तुत प्रसंग में नायक जय के अंतर्द्वंद को दर्शाया गया है। एक ओर वह नायिका ऊषा को अपने मार्ग की बाधा मान कर पीछे छोड़ आया है किंतु दूसरी ओर वह खुद ही से हारता नज़र आ रहा है। प्रस्तुत है जय का ये अंतर्द्वंद :-

 

कौन अरे!

आवेष्टन में छिपा हुआ वह कौन, प्रदीप सा मौन,
जलता सा वह शब्द तुम्हीं तो नहीं कहीं ?

इस मानस में देवि! तुम्हारी छवि क्या अर्थ लगाती है
लौट लौट क्यों मानस में वह परम चेतना छाती है ?
देखा अंतर मे झँखकर तो, तुमको हँसता ही पाया
सागर तट पर पूर्ण ज्योत्सना में ज्यों हल्का ज्वार आया।
तो फिर आज भला इस मन मे अंधकार क्यों आलोडित है
इस मानस मे मूर्त हुई वह निधि क्यों इतनी आज जडित है ?
चमक न पडती क्यों वह ज्वाला, अंधकार ही भरा रह गया
क्या प्राचीर पुराना सा वह ज्योति दीप का ढहा गया ?
आँख मँद लेता हँ प्रतिपल, क्या यह तामस मिट जाएगा
पर तामस से आँख चुराकर, तामस ही बस रह जाएगा।

पंचदीप प्रज्ज्वलित हुए जिस मानस से साक्षात मिलाकर
अंधकार जड हुआ हृदय का, था उसकी शाखों में जाकर
इस जडता की जड तुम ही हो, और ह्नदय का यह चिंतन
एक तुम्हारे फिर जाने से प्राण-प्राण का करे रटन।
जड को ही साक्षात मिटा दूँ, किंतु अरे! यह दुर्बलता!!
तुम आती हर बार सामने, बढ जाती है आकुलता।
कहती- मुझको रहने दो हे छली! स्वयं को छलो नहीं
मिट जाऊँगी मैं, सारा अस्तित्व तुम्हारा ढह जाएगा।
हार मान लो ढीठ हठी! यह मिथ्या अपना हठ छोडो
मैं यदि गई हृदय से बोलो , शेष वहाँ क्या रह जाएगा ?

किंतु कहाँ अभिमान मानता अपनी प्रथम पराजय को
बार बार आवेशित करता , अपनी ममता में जय को।
राष्ट्र-चेत में लगा हुआ , किस ओर मुझे ले जाओगी ?
राष्ट्र -भाव यह ढह जाए, किस भाँति भला यह चाहोगी ?
किंतु राष्ट्र भी काम न आया , चिंतन सारा धरा रह गया
जिसको चाहा सदा मिटाना , वह पूर्ण-प्रतिभ बन खडा रह गया।
बोली वह- मैं मूर्त सत्य हूँ , राष्ट्र अमूर्त, अचेतन है
भौगोलिक वह जडता है, मैं तेरा अंतर्चेतन हूँ।
खोज वहीं तक रूकी नहीं , जब तक न मिली थी मैं तुमको
आज मिली तो ठहर गई वह खोज भला क्यों, सत्य कहो ?

और धर्म का मर्म खोजते, पहले अपना मर्म जान लो
मैं ही तो वह कारण जिससे जीवन धारण कर्म जान लो।
और धर्म का सार भला क्या कोई कैसे यह जाने ?
सारहीन जीवन में कैसे कोई उसका उद्गम माने ?

धर्म-साधना का मिष लेकर , मुझको ही तुम खोज रहे थे
मैं तुम को मिल गई, मिला वह, जिसकी बरबस सोच रहे थें।
मैं ही हूँ वह स्पर्श, महकने लगी हुई जो कलि-कण में
मैं ही यदि फिर गई, न होगी कोई मधुता मधु-कण में।
अब यह अंतर पूर्ण समझ लो, अब यह रटना उषे! उषे!
अब ना कोई छद्म चलेगा, नहीं समझना अन्य मुझे।

उठ आया निष्चेष्ट वहाँ से, फिरा तनिक उत्क्लांत गात्र से
वहाँ कदम्ब की छाया में फिर जलधारा कि तट तक भी
वन-कुंजों में फिरा, खगों का दल भय से आक्रांत हुआ
जल में उतरा, धाराओं ने तट को गोलाकार छुआ।
दादुर ने मुख तनिक उठाया, फिर वह गहरे कूद पडा
उठा वहाँ से वन की ऊँची एक डाल के निकट खडा।

जाओगे जिस ओर मुझे ही राहों मे तुम पाओगे
खिझियाते हो पथिक क्यों भला, कैसे बचकर जाओगे ?
लौटा जब फिर जलधारा में देखा- वो ही मुख झिलमिल था
लहरें भी कुछ चुहल मचाती, जिसमें नभ भी शामिल था।

फूलों में भी उसकी ही छवि, वही कूकने लगी कान में
धरती से आकाश जहाँ मिल जाता, आती वही सामने।
यह अंतर का आवेष्टित पट कब तक रीता रख पाओगे
जब देखोगे पार- सामने, मुझको हँसता पाओगे।

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About the Author:

हालिया निवास- देहरादून शिक्षा- एम0ए0 अंग्रेजी, यू0जी0सी0 नेट (अंग्रेजी), एम0ए0 हिंदी, एम0ए0 इतिहास। सम्प्रति- प्रवक्ता अंग्रेजी।

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