सच्चे रिश्ते

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सच्चे रिश्ते – लधुकथा ‘मनु’ की कलम से

नमन सुबह जल्दी ही नहा धोकर तैयार हो गया था । आज रक्षाबंधन है । दीदी आएगी गाँव से यह सोच कर उसका मन उमंग से भरा जा रहा था । हर साल की तरह इस बार भी वह दीदी के लिए साड़ी मिठाई और गिफ्ट लाकर रख चुका था । अचानक उसकी विचार ट्रेन को ब्रेक लग गए । एक महिने पहले ही उसकी पत्नी और दीदी में झगड़ा हो गया । बात बच्चों के खेल में हुए झगड़े से शुरू होकर बड़ों मे आ गई पता ही नहीं चला । बात इतनी बढ़ गई थी कि उसकी पत्नी उमा ने आवेश में आकर यह तक तब दिया था अगर सगी बहन होती तो इस रिश्ते की कद्र करती आखिर खून का रिश्ता तो है नहीं । और दीदी यह आपेक्ष न सह सकी वह अपनी बेटी को लेकर रोते हुए उसी वक्त चली गई गाँव । देर शाम नमन दीदी …दीदी…पुकारता हुआ आया । मगर घर में सन्नाटा था । उसने उमा से पूछा वह भी मूँह फुलाए बैठी थी । कुदेरने पर उसने सारी बात बताई । नमन ने फौरन फोन किया परन्तु उधर से कोई उत्तर नहीं आया । सोचने लगा उमा तो छोटी है नासमझ है परन्तु दीदी को तो मेरे आने तक का इन्तजार करना चाहिए था । उसके बाद शर्मिंदगी के चलते उसने दीदी से बात भी नहीं की आज एक महिना बीत गया उन बातों को । वह निढ़ाल यंत्रवत चौकी के पास बैठा रहा । सोच रहा था आज राखी का त्योहार है मैं ही दीदी के पास जाकर माफी माँग लूँगा । दीदी उमा को माफ कर देगी । यह सोच कर वह खरीदा हुआ सारा सामान सूटकेस में रखकर बिना उमा को बताए दरवाजे की तरफ बढ चला । जैसे ही दरवाजा खोला तो उसका चेहरा मारे आश्चर्य के खुला का खुला रह गया सामने दीदी खड़ी थी । वह कुछ भी बोल नहीं पा रहा था । दीदी ने कहा अन्दर नहीं बुलाओगे मुझे नमन । हड़बडाया सा नमन बोला आओ …आओ …दीदी … मैं तो आपका ही इन्तजार कर रहा था ।
परन्तु सूटकेस देखकर तो कुछ और ही मालूम होता है ? दीदी बोली ।
नहीं ! नहीं ! ये तो यूँ ही !
मुझे मत बना बचपन से जानती हूँ तुझे तू कैसा है ? शरमा रहा था मेरे पास आने से ।
क्या जवाब देगा उमा की बात का ? वगैरह वगैरह …यही सोच रहा था न ?
हाँ दीदी । नमन ने सिर झुकाकर कहा ।
अरे पगले ! सच्चे रिश्तों की गाँठ बहुत मजबूत होती है । ऐसे ही नहीं टूटती । मानती हूँ मैं सगी बहन नहीं तुम्हारी, परन्तु जब से तुम्हारे पापा ने मुझे धर्म की बेटी बनाया मैंने कभी तुम्हें अपने से अलग नहीं समझा । हाँ कुछ दिन पहले जरूर उमा ने यादों ताजा कर दी थी पर मैं भूल गई इस बात को । जा थाली सजा राखी की रक्षाबंधन का मुहूर्त निकला जा रहा है और हाँ ..उमा को भी कह दे मैंने उसे माफ कर दिया ।पास ही कुर्सी से चिपकी उमा यह सब सुन रही थी आगे बढ़कर दीदी से लिपटकर रोने लगी । उसके आँसू ही इस पवित्र और सच्चे रिश्ते के साक्षी थे ।
थाली सजी और एक बार फिर सच्चे रिश्तों का रक्षाबंधन मनाया गया ।

कथाकार – मनोज कुमार सामरिया ‘मनु’ (मौलिक सृजन)

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नाम - मनोज कुमार सामरिया ‘मनु' जयपुर , राजस्थान

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