नारी तू संभल जा

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नारी तू संभल जा

By |2018-05-18T22:35:43+00:00May 18th, 2018|Categories: आलेख|Tags: , , |0 Comments

नारी तू संभल जा
नारी को अब संभल जाना चाहिये।नारी को अब दूसरी नारी के साथ ऐसा व्यवहार करना चहिये
जैसा वो स्वंम के साथ चाहती है।कब तक वो दूसरी नारी के दुख का कारण बनती रहेगी ।कब तक?अपने जीवन मे उसे ऐसी भूमिका निभानी चाहिये
जो किसी का घर बनाए तोडे नही।यदि वह मां की भूमिका मे है तो वह ऐसी व्यवहार करे कि बेटे का घर स्वर्ग बने।बेटे को बहु के खिलाफ और उसके मायकेवालो के खिलाफ बातें कर करके उसके दिल और दिमाग को परेशान ना करे।आजकल सहनशक्ति का सर्वथा आभाव है पत्नी और मां के चक्कर में पिसता आदमी है वहआपनी गृहस्थी नरक बना लेता है मां पर अंधा यकीन करके उसे अपनी पत्नी पर विश्वास करन नही छोडना चहिये।एक बात को बार बार जब बेटे के कान मे भर दिया जाता है तो बेटा अपनी मां की बात को सच मानता है और लाख यत्न से भी उसकी मानसिकता अपनी पत्नी और उसके परिवार के प्रति लगाव नही हो सकता।।क्या फोन का प्रयोग दूर बैठ कर भी दखलअदाजी के लिये ही करना चाहिये।पक्षी भी जब उनके बच्चे बडे हो जाते हैं तो उन्हे खुला आसमान देतें ँहै ताकि उनकी उडान विकसित हो सन्तान को अच्छे संस्कार देँ वह आपके स्नेह से बंधे नाकि चुगलियों के रिमोट से। बेटीयां अपने ससुराल का प्रबंधन करे मायके का दायित्व अपनी भाभी पर छोडे आज नही तो कल अनुभव सब सिखा देता है।बहुएं प्रेम और समझदारी से अपनी गृहस्थी संभाले।
समय की आवश्यकता है प्यार।अब परिवार मे एक एक दो दो सदस्य है एक दूसरे की बूराईयां कर रिश्तो को समाप्त करने की बजाए अपनी सोच यह बनाए कि सबको अपनी जिंदगी जीने का अधिकार है।दखलअंदाजी से बचे ।जियेंऔर जीने दें।सुख-दुख में
साथ दें मस्त रहे।खुश रहें।

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