सभी बनाते हैं अपना एक किला…..। मजबूत दीवारों से जो विपरीत परिस्थितयों का डटकर सामना कर सके ..लोगो को सुरक्षित रखें। हर व्यक्ति किलों को निहारता है सवांरता है उसके रखरखाव में हर एहतियात करता है। किलें की प्राचिर पर लगी अपनी ध्वज को हर रोज निहारता और गौरोवान्वित होता हैं। पर समय क साथ किले में सेंध लगना शुरू हो जाता है और धीरे धीरे किले की नीव हिल जाती है और वह अपने विलय की ओर बढ़ता जाता है।

हर किले की विध्वंसता में हर बार विभीषन का ही हाथ नही होता ।कभी कभी नये किले की निर्माण भी पुराने को मिटाने के लिए पर्याप्त होता है। एक स्वतन्त्रता की चाह तब तक पूरी नही हो सकती जब तक आप दूसरों के साए या संरक्षण में रहे। हर व्यक्ति अपने जीवन में एक किला निर्माण करता है। पुराना किला हर बार अपना वजूद खोता है और अपने सपनों को नये किले के साथ जोड़ने की निरतंर कोशिश करता है क्योकि वो बंध चूका होता है अपने रहने वालों के जीवन के साथ।

लेखक / लेखिका – डॉ. वंदना मिश्रा

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