मेरे हिस्से का आसमान

मेरे हिस्से का आसमान

By |2018-05-20T09:48:04+00:00May 20th, 2018|Categories: कहानी|Tags: , , |2 Comments

आसमान आधी रात बीत चुकी थी । अचानक आँख खुल गयी फिर काफी देर कोशिश की सोने की , पर नींद नहीं आयी। उठ कर बाल्कनी में जाकर बैठ गयी । मन यादों के झरोखों से बहुत पीछे चला गया।

भगवान ने कितनी छोटी सी उम्र में क्या क्या नहीं दिखा दिया । पति के साथ रह्ते भी विधवा का जीवन व्यतीत किया। उदय ने कब मेरी परवाह की लेकिन सोचती रही कि बच्चों से लगाव होगा तो मुझसे भी शायद हो जायेगा एक दिन। लेकिन किस्मत में जुदा होना लिखा था । पैसे की कमी नहीं रही कभी लेकिन साथी कभी नहीं मिला जो मुझे समझ सकता । किस्मत से लड़ते लड़ाते उम्र आधी बीत गयी। सोच ही रही थी कि तभी कुछ चमकते जुगनू दिखे। इतने अँधेरे में भी टिमटिमा रहे थे। मानो कोई सन्देश दे रहे हों । शायद कभी हार न मानने का । एक जुगनू धीरे से कानों में कह गया— तू जी ले ज़रा ।

हाँ लेकिन अब सभी फ़र्ज़ पूरे हो गए | बच्चों को उनके पैरों पर खड़ा करने के लिए जितना कर सकी किया| सब के लिए बहुत जी मर ली | सभी ने तो अपनी ज़िन्दगी में जो चाहा वो किया | मैं ही कभी मन की नहीं कर पायी जब भी चाहा अपने लिए कुछ तब परिवार की कोई न कोई ज़िम्मेदारी पाँव की बेड़ी बन गयी | उदय भी तो मंझधार में छोड़ गए मुझे | वो भी ऐसे समय जब मुझे उनकी सबसे ज़्यादा ज़रुरत थी | उन्होंने भी तो मन की करने में कोई कसर नहीं छोड़ी | तब गए तो आज तक मुड कर नहीं देखा | न कभी मेरी न बच्चों की सोची | क्या पैसे से ही सारी ज़िम्मेदारियाँ पूरी हो जाती हैं ? क्या बच्चों की ज़िन्दगी में पिता की कोई अहमियत नहीं होती ? हे भगवान ये सब कहाँ से घूमने लगा दिमाग में ! नहीं अब और नहीं निभा दिन अपनी ज़िम्मेदारियाँ मैंने अकेले ही | उदय भी तो अपनी दुनिया अलग बसाये मस्त हैं | तो फिर मैं ही क्यों ? कल रात ही तो मुझे चमकते जुगनुओं ने राह दिखाई थी नयी | और आज यह सब | नहीं अब नहीं अब मुझे भी जीना है अपने लिए अपनी ख़ुशी के लिए अपने सपनों के लिए |

मैंने अपने सर को एक ज़ोरदार झटका दिया मानों ऐसा करने से हर फालतू की बात को दिमाग से झटक कर दूर फेंक दूँगी | कोशिश ज़रूर करूंगी |

शादी से पहले फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया था कितने अरमान थे कितने सपने थे कि मैं अपना लेबल लॉन्च करूंगी | लेकिन गृहस्थी में एक बार जकड़ी तो सब सपने धरे के धरे रह गए | अब करूंगी , ज़रूर करुँगी | किसी भी नयी शुरुआत के लिए कभी देर नहीं होती | और फिर रुझान तो मेरा कभी टूटा ही नहीं | इसी चक्कर में कंप्यूटर भी तो सीख लिया था मैंने |

आज मेरी ज़िन्दगी कि नयी सुबह है | आज से ही नयी ज़िन्दगी कि आगाज़ होगा |

सब कुछ बहुत आसान लग रहा था लेकिन अब सोच रही हूँ तो समझ ही नही आ रहा कि कौन सा सिरा कहाँ से पकड़ूँ | अरे हाँ याद आया ऋतु है न | हम दोनों ने एक साथ ही तो ट्रेनिंग ली थी | सोशल मीडिया पर तो उसके डिजाइन देखती ही रहती हूँ फोन नम्बर भी मिल जायेगा कॉल करती हूँ उसे |

“हेलो ”

“कौन पुन्नो ? ”

उसने हेलो कहते ही मुझे पहचान लिया चार साल पहले ही मिली थी पर ज़्यादा बात नहीं होती थी |

“वाह पहचान लिया”

“कैसे नहीं पहचानती ,और बता आज इस नाचीज़ को कैसे याद किया ? तुझे तो कभी फुर्सत ही नहीं मिली अपने घर से ”

“क्या यार ताना मत मार अब छोटी उम्र में शादी हो गयी थी मेरी और फिर न चाहते हुए भी चार बच्चे | क्या करती दो बेटियों के बाद सबको बेटा चाहिए था | मेरी तो चलती ही नहीं थी तुझे पता है |”

“हाँ पता है यार फिर तेरे ट्विन्स हो गए ”

“हम्म अब मैं फ्री हूँ सोच रही हूँ अपने शौक पूरे कर लूँ ।”

“अरे वाह मेरी बिल्ली | चल फिर मिलते हैं किसी दिन ।”

“किसी दिन क्या इसी संडे मिलते हैं ।”

“चल ठीक है कनाट प्लेस मिलते हैं अपनी पुरानी जगह |”

“डन,ओके बाय ”

ऋतु से बात करने के बाद जैसे मेरे सपनों को पंख लग गये । सोचा आज बुधवार है तब तक थोड़ा अपना हुलिया ठीक कर लूँ | ऋतु से मिलना है कहेगी , ” क्या ओल्ड फैशन कपडे पहने हैं फैशन डिज़ाइनर मेरी फैशन डिज़ाइनर “| हाहाहा |

पार्लर भी जाना है | ऋतु से बात करके मैं नयी ऊर्जा से भर गयी थी झट से अपॉइंटमेंट ली और पार्लर गयी | अपना हेयर स्टाइल बदलवाया सबसे पहले नए स्टाइल के बाल अच्छे लगेंगे | फिर उन्हें कह दिया कि मेरा मेकओवर कर दो | मुझे खुद को नए रूप में देखना है | बस फिर क्या था उन्होंने मेरा रंग रूप ही बदल दिया | खुद को आईने में देखा तो देखती ही रह गयी | क्या मैं आज भी इतनी सुन्दर दिख सकती थी कभी सोचा क्यों नहीं मैंने !!

अगला दिन मैंने शॉपिंग के लिए रखा | अपने लिए आज के फैशन के हिसाब से कपडे खरीदे | घर आकर सोचा यह सब तो हो गया अब थोड़ा लैपटॉप की सुध लेनी होगी खुद को आज के फैशन ट्रेंड से अपडेट तो कर लूँ न |

बस संडे तक कैसे समय निकला पता भी नहीं चला |

अपनी पुरानी जगह ठीक समय पर दोनों मिले | खाया पीया मस्ती की और पुराने दिन याद किये | दोस्तों की बातें भी कीं | फिर मुद्दे की बात शुरू की |

“अच्छा बाकी छोड़ अब ये बता मैं अपना बिज़नेस कैसे शुरू करूँ ?”

वह हंसने लगी और बोली, “ देख जल्दी मत कर इतनी | ऐसा कर पहले मेरे साथ ही आजा | काफी सालों से तू टच में नहीं है तो ठीक रहेगा | फिर कर लेना काम शुरू |”

“ठीक है तो बता कब से आऊं ?”

“कल से ही आजा |”

अरे वाह कल से ही ? चल फिर कल ११ बजे मिलते हैं |

घर आकर मैंने सपने बुनना शुरू कर दिया | सोचा नहीं था कि नयी ज़िन्दगी इतनी जल्दी शुरू हो जायेगी |

अगले ही दिन से मेरी ठहरी हुई ज़िन्दगी में रवानी आ गयी | काम में मन लगा तो मैं सारे दुःख भूलने लगी | अब तो बस हंसी, ख़ुशी पार्टियों का दौर , मीटिंग्स यही सब रहने लगा | ऋतू के दोस्तों से भी मुलाकात होने लगी फ्रेंड सर्किल अच्छा हो गया | ऋतू के साथ मैंने भी ज़ुम्बा क्लास ज्वाइन कर ली |

आह ! कहाँ दुखों में डूबी थी मैं ! मेरी ज़िन्दगी इतनी पास थी लेकिन कभी सोचा ही नहीं | सबकी ख़ुशी में ही बिता दिया जीवन | अभी उम्र ही क्या है | १८ की ही तो थी जब शादी हो गई थी | ५२ की उम्र भी कोई उम्र है निराश होने की |

पार्टियां अटेंड करते करते ऋतू के और मेरे म्यूच्यूअल फ्रेंड अभिजीत से काफी बातें होने लगीं | वे भी मेरी ही तरह अकेले थे | बच्चे तो कभी थे ही नहीं उनके और पत्नी की असमय मृत्यु हो चुकी थी | एक दिन वे बोले

“देखो हम दोनों ही उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहाँ शारीरिक से ज़्यादा मानसिक रूप से किसी साथी की ज़रुरत होती है | ”

मैं समझ रही थी उनका मतलब

“आगे आगे उम्र बढ़ेगी और आपस में हम एक दूसरे का दुःख भी बाँट सकेंगे | मन की बात कहने सुनने को कोई चाहिए होगा |”

“आपकी बात समझ रही हूँ लेकिन बच्चे —-”

“देखो बच्चे अपनी दुनिया में खोये हुए हैं | तुम कब तक अकेली रहोगी । अब अपने लिये सोचो । वैसे बात करके देखो ,आजकल के बच्चे बहुत प्रोग्रेसिव सोच के हैं | मेरे हिसाब से उन्हें कोई ऐतराज़ नहीं होगा |”

” मुझे थोड़ा समय चाहिए | बच्चों से ज़रूर बात करूंगी तभी कोई फैसला लूंगी |”

|”मुझे कोई जल्दी नहीं है और तुम इंकार भी

कर दोगी तो मुझे बुरा नहीं लगेगा |”

मुलाकात के बाद घर लौटने पर मन में अजीब सी हलचल थी | एक अपराध बोध था मन में कि क्या इस उम्र में यह सब—फिर सोचा सारी ज़िन्दगी अकेले ही तो काट दी । उदय ने कब परवाह की मेरी। और फिर दुनिया दो चार दिन बोल कर चुप हो ही जायेगी । जानती हूं यह कोई छोटा कदम नहीं है लेकिन मेरे जुगनू अब भी मुझसे कुछ कह रहे हैं । बहुत सोच समझ कर मन में आया कि अपनी बेटियों से तो मैं बात कर ही सकती थी |

मैने इस बारे में रितु की सलाह लेनी चाही । रितु मेरी तरह पुरानी सोच की नहीं थी उसने तो सुनते ही मुझे बांहों में भर लिया और नम आंखें लिया ंंमेरा हाथ पकड कर अपने पास बिठाया।

आज तूने ंंमेरे ंंंंमन की बात कह दी। ंंमैं तो जाने कब से रश देख रही थी इस दिन की अभिजीत ंंने ंंमुझसे पूछ कर ही बात की थी तुझसे । ”

“अच्छा तो तूने मुझे बताया क्यों नहीं ?”

चाहती थी वो खुद बाट करे और तुझे मैं ना समझाऊँ बल्कि तू खुद अपनी खुशी के बारे में सोचे। अब बिंदास हां कह दे। ”

“लेकिन बच्चे — और दुनिया वाले क्या सोचेंगे?

“छोड़ तू दुनियादारी । लोग तो कुछ न कुछ कहते ही हैं। और बच्चों को क्या नहीं पता कितने दुख और अकेलापन झेला है उनकी माँ ने ! तू कहे तो मैं बात करूं बच्चों से वो मान जायेंगे । आज की सोच के हैं ।

उसकी बातों से मुझे संबल मिला मैने चारों बच्चों को घर बुलाया | और अपनी बात कह डाली | आश्चर्य की बात है कि बेटियां खुश हो गयीं | मुझे लगता नहीं था कि वे मेरे लिए इतनी भावुक हो जाएँगी | पर बच्चे तो बच्चे होते हैं वे व्यस्त ज़रूर हैं पर मुझे बहुत प्यार करते हैं |

” मां वी आर वैरी हैप्पी फॉर यू | गो अहेड |” मीना ने कहा | बेटे थोड़े झिझक रहे थे पर बहुओं ने हामी भर दी |

मुझे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कीतनी आसानी से ंंमाँ जायेंगे।ब खुश थे | और अगले ही महीने कोर्ट मेरिज की बात भी तय हो गयी | अभिजीत तो तैयार थे ही । मैंने उन्हें बच्चों से मिलाया |

शादी का दिन भी आया सभी बच्चे ऋतु और उसका परिवार और अभिजीत के परिवार के कुछ लोगों कि मौजूदगी में शादी हो गयी |

सभी बच्चों ने मिलकर पार्टी अरेंज की | शादी के बाद जब सब चले गए तो बच्चों ने अभिजीत से कहा , “थैंक्यू पापा | सारा जीवन पापा के लिए तरसे अब आप मिल गए हैं | वी आर सो लक्की ! “

अभिजीत भी अपने लिए पहली बार पापा सम्बोधन सुनकर भावुक हो गए | और बच्चों को गले से लगा लिया | माहौल थोड़ा भारी हो गया था तो अभिजीत ने कहा,

”चलो अब मेरे फैशन हाउस को भी मालकिन मिल जायेगी | सब ने ठहाका लगाया |”

मुझे आज अपने भीतर किसी तरह का अपराध बोध नहीं होना चाहिए आखिर उदय ने तो मुझे दुखों की आग में इतने बरस पहले झोंक ही दिया था न !

“मुझे भी हक़ है , अपने हिस्से का एक मुट्ठी आस्मां मुझे भी तो चाहिए ।”

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About the Author:

बीस वर्षों तक हिन्दी अध्यापन किया । अध्यापन के साथ शौकिया तौर पर थोडा बहुत लेखन कार्य भी करती रही । उझे सामजिक और पारिवारिक इश्यों पर कविता कहानी लेख आदि लिखना बेहद पसन्द है।

2 Comments

  1. SUBODH PATEL May 20, 2018 at 10:38 am

    जब हमें मुसीबत आती है तो समाज कभी साथ नही देता। तो हमें पूरा हक है अपनी ज़िंदगी जीने का

    आपके द्वारा लिखी ये पंक्तियां वेदना, भाव और अहसासों से भरी हुई है हो सकता ये लेख पढ़ने के बाद कोई अपनी ज़िंदगी फिर से जी सके

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  2. Manju Singh May 20, 2018 at 11:37 am

    बहुत आभार सुबोध पटेल जी ! सही कहा आपने ।कहीं कुछ पढ़ कर या देख सुन कर कोई कोई प्रेरणा ले लेता है। लेखन सार्थक ही तब होता है जब हम कोई संदेश दे सकें।बहुत बहुत आभारी हूं।ऐसा विषय लेने में थोडा लगता है कि पाठकों की न जाने क्या प्रतिकृया मिले लेकिन आप जैसे सुधि पाठक प्रेरित करते हैं लिखने के लिये ।

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