श्री आद्य शंकराचार्य का अवतरण क्यों हुआ ?*
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हम सभी यह जानते हैं कि भारत देवताओं की भूमि है, उपनिषदों ,वेद,पुराणों की भूमि है। कुल मिलाकर भारत भूमि अपने आप में वंदन के योग्य है, अभिनंदन की योग्य है। यहां पर देवताओं के अवतार हो चुके हैं और इसके प्रमाण भी हैं। इसी भारत भूमि पर आदि शंकराचार्य का अवतरण किस प्रकार हुआ, यह एक कथा है। इसके बारे में हम बताते हैं क्योंकि जब जब कलयुग में बुराइयों की अधिकता होती है, पाप और अधर्म फैलता है ,सत्यता की कमी होती है, धार्मिकता की कमी होती है, नैतिकता, सामाजिकता का ह्रास होता है, तभी किसी न किसी धार्मिक दैविक अवतार इस धरती पर जन्म लेता है, जो इन सभी भावनाओं का पुनरुद्धार करता है। इसी के बारे में अग्रिम कथा वर्णित की गई है।

आज से लगभग २५०० वर्ष पूर्व भारत में ऐसा भयावह समय उपस्थित हुआ था , जब सनातन वैदिक धर्म एवं यज्ञ यागादि कर्म एकदम उपेक्षित हो गये, नास्तिकवादी बौद्धधर्म ने वैदिक धर्मों का निषेध कर डाला , अनधिकारी तथाकथित वैदिकों को मोहित करके वेदादि धर्मशास्त्रों के प्रति अनास्था उत्पन्न कर दी गयी, वर्णाश्रमधर्म के वैदिक आचारों को केवल धन्धा कमाने का साधन बता कर बौद्धों ने सर्वत्र ब्रह्म- विद्वेष फैला दिया ।

सारांश सनातन वैदिक धर्म धर्मप्राण देश भारत में ही खिसक रहा था , दम तोड़ रहा था । मुट्ठी भर वैदिक, मूल संरक्षण में निरत रहकर वेदों के मूल की रक्षा कर रहे थे । वह चिंतित थे कि #को_वेदान्_उद्धरिष्यति ? श्रीभगवान् बुद्ध ने जो उपनिषद् मूलक धर्म उपदेश दिया था, उसे भी प्रमादवश भुला दिया गया था, उसमें भी विकृति आ गई थी । सारा राष्ट्र अनीश्वरवाद में दीक्षित हो कर मौज -मजा -आनन्द उड़ाने के सिद्धान्त का पालन कर रहा था । त्याग का स्थान भोगवाद ने ले लिया । वैदिक कर्मकाण्ड की ऐसी दुर्दशा हो रही थी कि वेदों को भाण्डों, धूर्त्तों और निशाचरों की रचना बताया जा रहा था ।
तत्कालीन शासक भी विपरीत प्रभाव में बह गए थे । शक्तिशाली बौद्धों के समुदाय शिष्य और संघ के साथ राजाओं के महलों में प्रवेश करके घोषित कर देते थे कि राजा उनके मत का है , देश उनका है , वैदिक मार्ग का सर्वथा त्याग कर दो !

ऐसा भयावह समय इस राष्ट्र में उपस्थित होने पर जब यज्ञादि बंद होने से देवगण भी सन्तप्त हो गए तो तब सब देवता कैलाश पर्वत पर #भगवान्_शंकर की शरण में गए और सम्पूर्ण स्थिति निवेदित करते हुए कहा – प्रभो ! आजकल कोई मनुष्य सन्ध्या वंदन आदि वैदिक -कर्म नहीं करता, ना ही सन्यास सेवन करता है । सभी पाखण्ड में निरत रहते हैं । यज्ञ शब्द भी कान में न पड़े , अतः कान बन्द कर लेते हैं लोग । परमात्मा का प्रतिपादन करने वाली श्रुतियों को बौद्धों ने दूषित कर अनर्थ कर डाला है । अधम कापालिक, ब्राह्मणों का सिर काट -काट कर भैरव की पूजा करते हैं । प्रभो ! अब तो दुष्टों का विनाश कर वैदिक धर्म की स्थापना कीजिए !

देवगणों की प्रार्थना स्वीकार करते हुए भगवान् शंकर ने कहा – कुमार कार्तिकेय ! तुम वैदिक धर्म के उद्धार के लिए भारत में अवतार लो ! ब्रह्मा जी व इन्द्र तुम्हारी सहायता के लिए उत्पन्न होंगे; हम स्वयं अवतरित होंगे तथा आप अन्य देवतागण भी मनुष्य रूप धारण कर भारतवर्ष में जन्म लो !

इस प्रकार कुमार कार्तिकेय कुमारिल भट्ट बने, ब्रह्मदेव मण्डन मिश्र के रूप में आए, इन्द्र राजा सुधन्वा के रूप में प्रकट हुए, विष्णु भगवान् सनन्दन ( श्री पद्मपादाचार्य) और शेषनाग पतंजलि के रूप में इस धरती पर आ गये । वायु बने हस्तामलक तथा वरूण ने चित्सुख के रूप में जन्म लिया । बृहस्पति आनन्द गिरि और सरस्वती ने उभय-भारती के रूप में जन्म लिया । अन्य -अन्य देवता भी देवाधिदेव भगवान् शंकर के निर्देशानुसार इस पवित्र राष्ट्र में मानव के रूप में अवतरित हो गये वेद का उद्धार करने के लिए ।

वेद के तीन काण्ड हैं – कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञान काण्ड । श्री मण्डन मिश्र तथा कुमारिल भट्ट ने कर्मकाण्ड का पुनरुद्धार किया । पतञ्जलि ने उपासनाकाण्ड की रक्षा की और ज्ञानकाण्ड का उद्धार करने के लिए स्वयं भगवान् शंकर #श्री_आद्य_शंकराचार्य के रूप में इस धरा पर अवतरण हुए ।

*#श्रुतिस्मृतिपुराणानामालयं_करुणालयम् ।*
*#नमामि_भगवत्पादं_शङ्करं_लोकशङ्करम् ।।*

नमामि शंकर।

संकलन एवम विश्लेषण कर्ता

डॉ विदुषी शर्मा

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