गुनाह कुछ भी नहीं फिर भी सजा सारी है।
बता दो जिन्दगी ये हाल क्यों हमारी है।।

कभी कभी तो आसमाँ कहर बरसते हैं।
इधर जमाने के भी जुल्मों सितम जारी है।।

तमाम दिक्कतों के दौर से गुजरते हुए।
जिन्दगी फिर भी बड़े शौक से गुजारी है।।

बना हुआ है जो उसको बिगाड़ देते हैं।
ऐसे लोगों से निपटने की जिम्मेदारी है।।

हम अपनी प्यास को दर दर लिये भटकते हैं।
हमारी जब कि समन्दर से बहुत यारी है।।
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**जयराम राय **

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