रिस्ते और मंजिल
मोहब्बत हो या दोस्ती दोनो ही लाजवाब हैं
गर दोस्त से ही मोहब्बत हो जाये, ये बड़ी बात है
मोहब्बत और दोस्ती, एक अजीब इतेफाक है
क्योंकि
दोस्ती हो या मोहब्बत, करना है आसाँ बहुत
पहला प्यार हो या दोस्त होना कोई बड़ी बात नहीं,
आखिरी दोस्त या प्यार बन जाना बड़ी बात है।।
न सोंचो कभी कि वो याद नही करते तो मैं क्यो करूँ
उन्हें रिश्तों की परवाह ही नही तो मैं क्यों करूँ
पल में सोंचो कि मैं तो हूँ उस जुगनू की तरह
जिसे सिर्फ जरूरत के वक़्त याद किया जाता है
जो होता है अंधेरों में एक मात्र सहारा
मुझे और क्या चाहिए रिश्तों के लिए ।।
हाँ मेरे यार मैं तुझसे ही मोहब्बत करता हूँ
दोस्ती हो या मोहब्बत ये वो दिल के रिस्ते है
जो अहसासों और भावों से बंधे हैं
न दूर जाने टूट जाते है
न पास रहने जुड़ जाते है
ये रिस्ते तो अहसास के धागों से बंधे है
हर पल याद आते हैं
पास होते है तो दूर जाने की ख्वाहिशें
दूर हों तो पास आने की ख्वाहिशें।।
मंज़िल पाने की ख्वाहिशात में
मोहब्बत या दोस्ती के रिश्तों को पीछे मत छोड़ देना
जब ख्वाबों की मंज़िल हकीकत में पास होती है
पीछे छूटे रिस्ते बहुत याद आते है
जो यार संग मंज़िल मिले
खुशियों की अलग शान होती है।।

सुबोध उर्फ सुभाष
21.5.2018

Rating: 4.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *