प्रेम डायरी राधे-कृष्णा 1

कान्हा कौन सा ये प्रेम सागर लाये
बजे बांसुरी तो प्रेम लहर मोहे आती देखाय,
मै भी एक किनारा बनना चाहु
तोहरी हर लहर से टकराना चाहु,

छाया भी मोहरी कर ली अपने रंग मे
नहीं रहा धीरज मोहे अब अंग,
धडकन भी म्हारी धक्क सी बड जाये
कानो मे जब तोहरी बांसुरी गुंजाये,

कर अब हमे अपने ही संग मे
छवि बसी हे तोहरी हमरी अखियन मे,
बना लो अपना दासी ,यह पद भी मोहे भाय
काहे कान्हा इतना प्रेम सागर ले आये

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