हे गिरधारी !

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हे गिरधारी !

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हे गिरधारी

सांझ – रात की मिलन की बेला
बीती मीठी यादों का मेला
कौन कहे अब कौन सुने रे
तारों की छैयाँ मन यह अकेला

नैना बरसें बोझ है भारी
हे गिरधारी !

इक – इक करके सपने टूटे
कौन पराये अपने रूठे
कसमें – वादे झूठे सारे
तन को सजाये गहने झूठे

झीनी चदरिया झूठी फुलकारी

हे गिरधारी !

अपनों का कुछ दोष नहीं है
क्या मैं बोलूं होश नहीं है
देता जाए दाता नहीं थकता
मेरे मन संतोष नहीं है

मांजत – मांजत कलई उतारी
हे गिरधारी !

राजा से रंक रंक से राजा
तेरा खेला तुझको साजा
पकड़ी गई है मेरी चोरी
मेरी मैं का बज गया बाजा

अब न मिले उधारी
हे गिरधारी !

नहीं लुभाते महल – दुमहले
मिटी लालसा जो थी पहले
नींद से नयना रूठ गए हैं
ले ले अपनी शरण में ले ले

देख मेरी लाचारी
हे गिरधारी !

-वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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