पर्यावरण

पर्यावरण

खड्ग उठाए वो कौन है?
क्यों तू अब भी मौन है ।
प्रदूषण बन खर-दूषण
भेद रहा ये आवरण।
छिन्न-भिन्न पर्यावरण
प्राण लीलता वातावरण
मृत्यु की तू छोड़ शरण
क्रांति का तू कर वरण
जीवन तुम्हें है पुकारता !
वादों की टंकार छोड़ ।
कोशिशों की बांध डोर ।
अब तीर चढ़ा तू कर्म का
न भटक -न थक
तू बन सजग
बेधड़क तू बन जा वीर !
भविष्य की तू बन जा नींव ।।
– मुक्ता शर्मा

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Mukta Tripathi

सरकारी स्कूल में हिन्दी अध्यापक के पद पर कार्यरत,कालेज के समय से विचारों को संगठित कर प्रस्तुत करने की कोशिश में जुटी हुई , एक तुच्छ सी कवयित्री,हिन्दी भाषा की सेवा मे योगदान देने की कोशिश करती हुई ।

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