माँ अब बूढ़ी लगने लगी है ।।

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माँ अब बूढ़ी लगने लगी है ।।

By |2018-06-12T06:01:37+00:00June 12th, 2018|Categories: कविता|Tags: , |0 Comments

 

माँ अब बूढ़ी लगने लगी है—
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माँ के जगने से
जगता था घर-आंगन ।।
सूर्य रश्मि छिटक कर ।
धूल पर बिखर कर ।
कर सुरम्य वातावरण
बन जाती थी पावन।।
अब वो माँ निस्तेज सी जगने लगी है।
माँ अब बूढ़ी लगने लगी है ।।

बिट्टू का नाम ले-लेकर ।
सीमा को आवाज दे-देकर ।
प्यार का रस बिखेर कर ।
रौनकें भरती थी जो
अब उसकी जुबान
कुछ शिथिल होने लगी है।
कमर थोड़ी सी झुकने लगी है।
माँ अब बूढ़ी लगने लगी है ।।

मस्त-मस्त थी पवन ।
भीनी-भीनी थी सुगंध ।
पकवानों में अमृत को घोल।
भिखारी के भी पूरे करती बोल।
डर-डर के चौंके में चढ़ने लगी है।
चाय में चीनी कम पड़ने लगी है ।।
माँ अब बूढ़ी लगने लगी है ।।

नसीहतों का बोझ उठा।
सास की हर बात सुन ।
पति के सब नख़रे उठा।
उलझनों को भी लेती बुन।
अब सारा छोड़ बांकपन
उसकी चुप्पी और बढ़ने लगी है ।।
जुबान बहू की छलनी करने लगी है ।।
बिट्टू के भी सिर चढ़ने लगी है ।।
माँ अब बूढ़ी लगने लगी है ।।

रानी इस घर-नगर की ।
दिखती नहीं भई !,गई किधर है ?
टूटा चश्मा कमजोर नज़र है ।
वृद्धाश्रम की विराना डगर है।
अब बीते कल में रहने लगी है ।
अकेली! पगली! क्या रटने लगी है ?
माँ अब बूढ़ी लगने लगी है ।।
।।मुक्ता शर्मा ।।

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About the Author:

सरकारी स्कूल में हिन्दी अध्यापक के पद पर कार्यरत,कालेज के समय से विचारों को संगठित कर प्रस्तुत करने की कोशिश में जुटी हुई , एक तुच्छ सी कवयित्री,हिन्दी भाषा की सेवा मे योगदान देने की कोशिश करती हुई ।

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