माली का कहर

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माली का कहर

By |2018-06-12T06:00:11+00:00June 12th, 2018|Categories: कविता|Tags: , |0 Comments

यह कविता पंजाब में फसल कटने के बाद बचे खुचे खेत के तिनको पराली को स्वयं किसान द्वारा ही आग के हवाले कर दिया जाता है के बारे में है।।जिसमें सड़क के किनारे के पेड़-झाड़ियाँ ,नन्हें पौधे,घास,बीज,फूल-फल,घोंसले,छोटे-बड़े लाभदायक जीव सब जल कर राख़ हो जाते हैं ।
जिसका वातावरण पर भयानक असर मौसम बदलते ही दिखाई देता है।
इसी विषय की तरफ इंगित करती रचना प्रस्तुत है ।

माली का कहर

असंख्य कई थे अगल-बगल ।।
माँ के गर्भ में रहे थे पल ।।
जन्म से पहले की बात वो ।
दोनों कुछ नजदीक से कर रहे थे जो ।
देखो भाई मैं बड़ा बनूंगा!
रोशनी से मैं पहले मिलूंगा!
मौसम है गर्म मगर जी उठेगा ।
मेरी कोमलता मासूमियत से
क्यारी का जीवन खिल उठेगा।
पर विधाता! यह कहर था क्या?
किसी ने फेंका ज़हर था क्या!
कुछ तपिश कुछ जलन
मालूम सी हुई थी ।
सुप्त,अनभिज्ञ,अनजान था मैं
अब तक शायद
सच्चाई जाहिर न हुई थी ।
रात्रि बीती हुई सुबह जब
चारों ओर था क्रंदन-शोर ।
न पंछी न सुन रहा कलरव
कैसी मनहूसियत भरी थी भोर ।
धू-धू कर सब साथी मेरे
जल चुके थे,कल बन चुके थे ।
अब न जीवन उनमें शेष था।
जले बदन और राख़ अवशेष था।
दिल धड़का यूँ ज़ोर ज़ोर से
माज़रा सारा समझ में आया ।
माली-जन्मदाता ने मेरे
आंगन में था कोहराम मचाया ।
फसल समेट सब बेच-सहेज
आग लगा मालिक ने मेरे
था कुछ समय बचाया ।
पीड़ियों की हानि न देख
कुछ पलों का स्वार्थी लाभ कमाया ।
उधर कुछ इंच नीचे मैं
तन-मन की गति को थामे
समेटे बैठे कर रहा था मनुहार ।
जीने की रब से लगा रहा था गुहार ।
शायद इंद्र ने किया था तरस !
यूँ थोड़ा-थोड़ा गया था बरस !
अब मैं सजग-सजग !!
कुछ संवर-संवर!!
कुछ डरा-भीगा सा
खड़ा होने को था तैयार
और लो नई थी भोर ।
स्वागत गीत में हुआ था कलरव
शायद सुना था मीठा सा शोर ।
भस्म मंडित शव से
मिल प्रकृति ने शिव बन
खुशहाली के बीज दिए थे बो ।
राख़ से बोझिल ओस की बूंदें
शायद खुशी से दी थी रो ।
रुष्ट हवाएँ अब भी गर्म
दिल का भाव बता रही थी ।
आहें भरती,उजड़े आंगन पर
अफसोस शायद मना रही थी ।
क्रूर कालिमा मंडित सच्चाई से
सबको अवगत करा रही थी ।
कभी शांत -कभी चुप
कभी बिफर-बिफर कर
मानव को थी चेताती !
अरे! कब उठेगा ?
कब जगेगा?
रूठ गई जो प्रकृति कभी
तो मूर्ख कहां राज करेगा?
प्रकृति बिन हे पुरुष!
तू तो धरती को खा जाएगा!
विकास के राकेट चढ़ फिर
बस अंतरिक्ष में ही जा मरेगा।

।।मुक्ता शर्मा ।।

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About the Author:

सरकारी स्कूल में हिन्दी अध्यापक के पद पर कार्यरत,कालेज के समय से विचारों को संगठित कर प्रस्तुत करने की कोशिश में जुटी हुई , एक तुच्छ सी कवयित्री,हिन्दी भाषा की सेवा मे योगदान देने की कोशिश करती हुई ।

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