मूक संवाद

मूक संवाद

ये मेरे बेटे अभिमन्यु के होने वाले बच्चे से मूक संवाद है,जो अभी तक इस दुनिया में आया भी नहीं था। मैं एक यात्रा पर थी, यूं तो, उस बच्चे के आने में अभी काफी समय है। लेकिन सफर में ही इस रचना को लिखा गया। उस समय जो मन के भाव थे, वो कविता रूप में हैं।
हे अजन्मे शिशु!! तुम्हें ढेरों शुभ आशीष!
तुमसे मेरा है यह मूक संवाद!!
अपनी मांपिता के प्रेम के प्रतीक,
दादा दादी के वंश परंपरा के वाहक,
भारतीय संस्कृति को आगे बढ़ाने वाले,
हे अजन्मे शिशु!! तुम्हें ढेरों शुभ आशीष!
मैं तुम्हें डराना नहीं चाहती,
बस आगाह करना चाहती हूं,
ताकि समझ सको देश-दुनिया,
अभी तुम हो सबसे सुरक्षित जगह पर,
जहां तुम्हें कोई भय, चिंता नहीं,
लेकिन दुनिया में आंखें खोलते ही,
शुरू हो जाएंगी,
सभी की अपनी-अपनी अपेक्षाएं,
हे अजन्मे शिशु!! तुम्हें ढेरों शुभ आशीष !
तुम्हारे नन्हें-नन्हें कदमों तले दुनिया होगी,
और छोटे-छोटे मगर मजबूत कंधों पर होगी,
सभी की अनगिनत अपेक्षाओं का भार,
हां तुम छू सकते, हो सभी तरह की ऊंचाइयां,
क्योंकि तुम अभिमन्यु के पुत्र/पुत्री, जो हो,
यह संवाद जारी रहेगा …
हे अजन्मे शिशु!! तुम्हें ढेरों शुभ आशीष!

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