मीठा – वीठा

मीठा – वीठा

” अरे यार ! आज तो अभी तक चाय ही नहीं मिली .”
” आज तो आप जल्दी जाग गए . और अखबार भी पढ़ लिया ”
” हाँ यार यही समझ लो पर आज चाय के साथ पकोड़ियां भी हो जायँ तो अखबार पढने का मजा दुगुना हो जाये .”
” क्या मतलब ? मजा दुगुना हो जाये . रोज तो अखबार पढ़कर तुम्हारा मूड खराब हो जाता है . आज अखबार में कोई लाटरी निकली है क्या जो सुबह – सुबह चाय के साथ पकोड़ियां भी याद आने लगीं ?
” सिर्फ पकोड़ियां ही नहीं कुछ मीठा भी हो तो सोने पे सुहागा होगा .”
” पहले बताओ और मीठा – वीठा छोड़ो , अपनी सुगर भूल गए क्या ? ”
” मुँह का जायका मत खराब करो भई. आज का अखबार वाकई बहुत अच्छा है . ”
” क्या अच्छा है , ये तो बता नहीं रहे बस गाते जा रहे हो की अच्छा है – अच्छा है .”
” कल शहर में सिर्फ एक लूट हुई , रिश्वतखोर इंजीनियर को लोगों ने उसके दफ्तर में जाकर हड़काया , सड़क बनाने वाले बेईमान ठेकेदार का काम पब्लिक ने रुकवाया , बलात्कार होने से पहले ही लड़की को बचा लिया गया , इलाके के थानेदार को उगाही करते रंगे हाथ पकड़ा गया और नौकरी से तत्काल बर्खास्त भी कर दिया गया , बूढ़े माँ – बाप को घर से निकलने वाले बहू – बेटे का सामाजिक बहिष्कार किया गया . इतना ही नहीं पब्लिक ने नेता जी के घर पर जाकर धरना दिया कि सिर्फ दो साल में उनके करोड़ पती होने का राज क्या है ? ”
” इन सब खबरों को पढ़कर आप क्यों इतना उछल रहें हैं कि आपकी जबान को पकोड़ियों की याद सताने लगी . ”
” कमाल है कल इतनी बड़ी – बड़ी बातें हो गयी और तुम्हे मेरी ख़ुशी का कारण ही समझ में नहीं आया .”
” मुर्ख जो ठहरी जो इतनी सरल बातें भी नहीं समझ पाती . समझदार पती महोदय आप ही खुलासा कर दीजिये न .”
” पिछले हफ्ते के अखबार उठा कर देख लो . हर रोज कम से कम एक बलात्कार , पांच – छह लूट , दो – चार धोखाधड़ी , पुलिसिया उगाही का नंगा खेल , नेता जी के झूठे आश्वासन , ठेकेदारों की खुली दलाली और सब तरफ अवैद्य निर्माणों की भरमार , से अटा रहता था अखबार और उठाओ आज का अखबार , पिछले दिनों से उलट सारी की सारी सकारात्मक खबरें . लोग जागरूक हो रहे हैं . वो सब जो गलत है , सुधरना चाहता है . ……………..क्या ये मेरे खुश होने के लिए काफी नहीं है ! ”
वह पति की ओर कुछ देर तक बड़े दुलार से देखने के बाद बोली , ” मारो गोली सूगर – फूगर को , आज तो आपको चाय के साथ मीठा – मीठा हलवा भी मिलेगा . ”
” अरे यार आज इतनी बड़ी खबर सुनाई है , कुछ असली वाला मीठा – मीठा भी तो होना चाहिए .”
” धत ! शरारतों से बाज नहीं आओगे .” श्रर्माहट भरी दृष्टि के साथ शिखा , चाय बंनाने चली गयी . उसे पकोड़ियां भी तो तलनी थी .

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा>

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