माता

माता

” क्यों रे तू मेरा ही गुणगान क्यूं करता है । मेरी ही गोद में क्यों आकर बैठ जाता है ? ” माँ ने बेटे से कहा ।
उसके शब्दों में मीठी सी डांट भी थी ।

” माँ , तुमने नौ महीने मुझे अपनी कोख में रखा । अपने रक्त – मज्जा से मेरे अस्तित्व को आकार दिया , मुझे इस दुनिया से अवगत करवाया , इतना ही नहीं अस्तित्व देने के बाद अपनी छाती से न केवल लगाये रखा , उस छाती का सबकुछ निचोड़ कर मुझे इस काबिल बना दिया कि मैं इस दुनिया में इस धरती पर खड़ा हो सकूं तो बता तेरे आँचल को छोड़कर कहाँ जा सकता हूँ । माँ मुझे क्या पता कि मेरा बापू कौन है ! तूने ही तो बताया न कि वो शख्स जो हमें छोड़कर दूसरी औरत के साथ भाग गया , वही मेरा बापू था । तूने तो मुझे नहीं छोड़ा न माँ ……. !
तो बता मैं तेरी गोद में क्यों न आऊं । तेरा गुणगान क्यों न करूं ? तेरे सिवा कौन है जो मुझे ममता से भरा आँचल दे सकती है ।? तू है तो मैं हूँ माँ , बाप तो कोई भी बन जाता । बता मेरी माँ कोई और बन सकता था क्या ? तुझ पर आंच आने से पहले मैं तेरे लिये फ़ना हो जाऊं माँ। तेरी कोख , तेरी गोद ही मेरे होने की वजह है और वो कोख वो गोद कोई और कैसे हो सकती है माँ ? इसलिए मैं तेरी गोद में आता हूँ माँ । इसीलिए तुझ पर मेरी जान कुर्बान है माँ ……..। ”
” तेरी जगह कोई और कैसे ले सकता है माँ ।”
तेरी नदियां , तेरा पानी , तेरे पहाड़ों , तेरे मैदानों की खुशबु ने मेरे बचपन को मेरी जवानी की राह पर डाला। मेरी रगों में तेरे सीने का दूध है , माँ ! मैं तेरी गोद में न आऊं तो कहाँ जाऊं माँ ! ”
” अब मुझसे ये सवाल कभी मत करना कि मैं तेरी ही गोद में क्यों आ जाता हूँ ! ”
मैं शरणार्थी की संज्ञा नहीं झेल सकता माँ ।

– सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

Comments

comments

No votes yet.
Please wait...
Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

Leave A Comment