मदन पीर

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मदन पीर

प्रेम बसा लो नयनों में
चंचलता चित्त के द्वार धरो
हे मृगनयनी हे मधुबाले
मेरा प्रणय – निवेदन स्वीकार करो

हे मृगनयनी हे मधुबाले . . . . .

क्लान्त मेरा मन अवज्ञा से
घायल मैं तुम्हारी मृगया से
निरीह से ऐसे मत खेलो
ले लो परामर्श प्रज्ञा से

प्रेम – समर की हे विजयनी
मम एकाकीपन नख – दंतधार धरो

हे मृगनयनी हे मधुबाले . . . . .

मधुमास में चन्द्रमा शीतल जल
धधकती तृषित कामना पल विपल
अवरुद्ध करो न दृष्टिपथ दृष्टिकोण से
मांगता अभयदान प्रेमजगत सकल

होनी तो निश्चित होनी है
इसे आज ही अंगीकार करो

हे मृगनयनी हे मधुबाले . . . . .

पुष्प – वाटिका भ्रमर खेलते कलियों से
वीथी चतुष्पथ जा मिलती दूजी गलियों से
मुझ – सा दूजा यहाँ कोई नहीं
संसार भरा है छलियों से

पूर्वजन्म – सा न मैं घिर जाऊं
विलंब न तुम इस बार करो

हे मृगनयनी हे मधुबाले . . . . .

भावी योजना चतुर्दिक प्राचीर खड़ी
बंदी कि मैं रक्षित भ्रांति – पीर बड़ी
अदृश्य मार्ग से तुम प्रवेश करो
मदन – तपन जलनिधि – तीर पड़ी

यौवनास्त्रों से सज्जित हे रति
विछोह – असुर पर अंतिम वार करो

हे मृगनयनी हे मधुबाले . . . . . !

वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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