विश्वासघात

Home » विश्वासघात

विश्वासघात

” तुमने मुझे धोखा दिया है , मेरी सम्वेदनाओं के साथ विश्वासघात किया है .वे इस आघात को सहन नहीं कर सकतीं  .इससे मैं विछिप्त हो जाऊंगा .”

” यह सब नियति का खेल था या थी मेरे मन की कमजोरी .मैंने कोई धोखा नहीं दिया .”

” तुम्हारे  मन की कमजोरी के खेल में , मेरा यह जीवन अपनी अंतिम सासों के कगार पर आकर रुक गया है .”

” तुम शब्दों का कोई भी जाल बुन लो , वह खेल अब फिर से शुरू नहीं हो सकता .”

“बड़ी बात तो यह है कि जिसे तुमने  खेल  का दर्जा दिया है ,मेरे लिए वह कोई खेल नहीं था .तुम्हें बताना होगा कि तुम किस रिश्ते से तुम्हें मेरे साथ घंटों बिताना स्वीकार्य था , मेरे साथ घूमना पसन्द था ,अपने  किसी भी प्रस्ताव की अनदेखी पर तुम रूठ क्यों जाती थीं ……..यहाँ तक कि मेरे सानिध्य के लिए तुम अपने पति तक की अवहेलना करने में भी पीछे नहीं हटतीं थीं ?”

“वह सब अब मैं याद नहीं करना चाहती और न ही वह सब दोहराना चाहती हूँ .”

“तुम्हें पता है कि मेरी दिनचर्या के हर पल का निर्धारण  तुम्हारी ही इच्छा -अनिच्छा से होता था ,तुम्हारी किसी भी बात को टालना मेरे लिए असम्भव था .”

” यह मैं तब भी स्वीकार करती थी .अब भी इससे मुझे इंकार नहीं है .”

” और जब मैं तुमसे पूछता था कि क्या तुम भी मुझसे उतना ही प्यार करती हो जितना कि मैं ? तब तुम्हारा एक ही उत्तर होता था कि मैं तुमसे अधिक तुम्हारे प्यार को प्यार करती हूँ .”

” यह भी सच है पर यह याद दिलाकर तुम सिद्ध क्या करना चाहते हो ?”

“तो फिर तुम्हें यह याद होगा की तुम्हारी इस स्वकरोक्ति से मेरा पूरा परिवेश उर्जित हो जाया करता था .”

” मैं आज भी जीवन के उन ऊर्जामय छणो के लिए ईश्वर का धन्यवाद करती हूँ पर मैं उर्जा के उसी स्वरूप को संचित कर अपने  भविष्य के शेष दिन बिता लूँगी .”

” इसके बाद की मेरी स्वीकारोक्ति भी तुम भूली नहीं होगी कि मेरे रक्त के हर कण में तुम्हारा समर्पण श्वास बन कर  तैरता है .”

” हाँ ,तुम्हारी इन  स्वीकारोक्तियों से मेरा रोम – रोम प्रफुल्लित हो जाया करता था, यह मुझे याद है .”

” अब तुम मुझे कहती हो कि मैं तुमसे न बात करूं और न ही  तुमसे मिलूं ! क्या यह विश्वासघात नहीं है ?”

” हम सभी तात्कालिक स्म्वेगों के पराभूत होते हैं , जीवन मैं स्थाई या शाश्वत कुछ भी हो तो बताओ .हम सभी घटनाओं के वशीभूत हो जीवन की प्राथमिकताओं को बदलने के लिए बाध्य हैं .”

” अगर शब्दों या भावनाओं का  यूँ ही अपमान होता रहा तो कौन किस पर विश्वास करेगा ?”

” क्या पता इसी विश्वास की खातिर एक बार की गयी गलती को सुधारा जा रहा हो ?”

” कोई भी सुधार  किसी के जीवन को दाँव पर लगा कर सम्भव है क्या ? यह कैसे हो सकता है कि गलती कोई करे और उस गलती का मूल्य कोई और चुकाए ? ”

“अपने   वर्तमान मानसिक – चक्र के वशीभूत होकर तुम केवल अपने तर्कों को ही सत्य मान बैठे हो . इस अर्ध – सत्य को अन्तिम सत्य के वे बादल मत बनने दो जिन्हें धुआँ  कहते हैं .”

” मेरी सम्वेदनाओं का प्रस्फुटन तुम्हारे प्रेम – निवेदन के गर्भ से हुआ है ,इन्हें  धुआँ कहकर इनका अपमान मत करो .”

” उसी निवेदन की एक कड़ी को और स्वीकार कर लो कि मैं तुम्हारी प्रेमिका से पहले एक ब्याहता भी हूँ .मेरे अस्तित्व की तरह मेरे इस अल्प भविष्य को भी तुम ही बचा सकते हो , इसलिए एक  एहसान यह भी कर दो कि मुझे भूलकर मुझे छमा कर  दो . तुम नहीं जानते कि तुम्हें दावँ  पर लगाने से पहले तो मैंने स्वयम को दावँ पर लगाने का निर्णय लिया  है .”

“यह निर्णय तुम अकेले कैसे ले सकती हो ?”

” तो अब तुम्हें निमन्त्रण दिए देती हूँ .मेरे इस निर्णय को तुम भी स्वीकार कर लो ……….हमारे प्रेम की यही नियति है ,भावनाओं का खेल हमेशा से ह्रदय से शुरू होकर मस्तिष्क पर समाप्त हो जाता है .”

” तुम कहना क्या चाहती हो ?”

“यही कि जिन कारणों से अब तक मेरी बात को महत्व देते आए हो ,उन्हीं कारणों से अब भी मेरी मजबूरी को स्वीकार कर लो .इसे विश्वासघात मत कहो .”

वह अपनी निरूत्तर मुखाक्रति से उसे निहारने लगा . उसके नेत्र बन्द हुए तो उसने पाया कि वह  उसी के साथ खड़ा है ..

– सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

Say something
Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...

Leave A Comment