प्रयास

कमल जोशी एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में वरिष्ठ प्रबंधक के पद पर था। कपडा खुदरा क्षेत्र में 12-13 वर्षों की मेहनत, भागदौड़ के बाद आखिरकार कमल को ऑफिस की नौकरी मिली थी। साल दर साल फुटकर बाजार की नब्ज़ टटोलते हुए देश के कोने-कोने में ख़ाक छानने के बाद कमल को कुछ आराम मिला था। वैसे काम में पैसा पहले भी ठीक ही था पर फुर्सत के नाम पर कुछ घंटे मिल पाते थे। उसे पहले की तुलना में आराम के साथ-साथ कंपनी के बड़े निर्णय लेने की संतुष्टि मिल रही थी। कमल को कभी काम से अलग शौक पालने का समय नहीं मिला। हाँ, कभी कभार नयी जगहें घूमना, वहाँ का इतिहास खंगालना उसे पसंद था। कमल को वो स्थान नहीं भाते थे जिनको पर्यटक स्थल, दर्शनीय स्थल का तमगा मिल चुका था। उसका मानना था कि इन स्थानों (और इनके आस-पास) रहने वालों का भला हो चुका है और इनके बारे में आम नागरिक को पर्याप्त जानकारी है। वहीं भारत में हज़ारों ऐसी जगहें थी जो अनछुई थी, वहाँ के लोगों, कलाकारों और कारीगरों को कुछ ख़ास फायदा नहीं हो रहा था।

अपने इस शौक में उसका खर्च परिजनों और दोस्तों को बेकार लगता था पर इतनी खूबियों में कुछ कमियां भी चल जाती हैं। करीबी दोस्त ने इसपर सवाल किया तो कमल ने समझाया –
“धरती के हर इंच ने कितने जन्म-मृत्यु देखे, असंख्य महान विभूतियों के कदम पड़े, किसी ने षड़यंत्र रचा और किसी ने भविष्य की योजना की नींव डाली। इतने इतिहास के बीच कोई जगह छोटी-बड़ी कैसे हो सकती है? बस शायद हमें किसी के बारे में ज़्यादा पता है और किसी के बारे में लगभग कुछ नहीं।”

कंपनी और उसकी सहयोगी संस्थाओं की तिमाही सभाओं और अन्य कार्यक्रम लोकप्रिय पर्यटक स्थलों पर किये जाते थे। धीरे-धीरे अपने अनुभव के आधार पर कमल ऐसी जगहों से अलग स्थानों पर दर्जनों बड़े आयोजन करने लगा। नये और कम संसाधन वाले स्थानों पर कंपनी को आये अतिरिक्त खर्चों को वह खुद वहन करने लगा। समय के साथ कमल का नज़रिया उसकी कंपनी ही नहीं बाहर के लोगों को भी समझ आने लगा। नयी परतों की तलाश में प्रतिद्वंदी संस्थाएं भी ऐसी जगहों को चुनकर आयोजन करने लगीं। कहीं द्वितीय विश्व युद्ध में आज़ाद हिन्द फ़ौज के बंकरों वाला गांव मिला तो कहीं 2 लुप्तप्राय पक्षियों के 4 महीने के प्रवास की एकलौती झील मिली। कमल एक जगह को केवल एक आकर्षण के लेबल में नहीं बांधता था। वह मानता था कि खोजने पर एक जगह खुद में शायद दो-दस या दर्जनों आकर्षण समेटे हुए हो। वर्षों तक इस तरह के सफल प्रयोग करने के बाद कमल ने काम छोड़ दी। उसने घरेलु पर्यटन के इस पहलु को सही तरीके से बढ़ावा देने के लिए छोटे दल के साथ एक स्वयंसेवी संस्था शुरू की।

अपने वर्षों के शोध को आधार बनाकर उसने भारत का विस्तृत डेटाबेस तैयार किया। जिसे वह नियमित रूप से नयी जानकारी के साथ बेहतर करता रहता था। जैसे मध्य प्रदेश में बेटवा नदी के दिशा बदलने के बाद उसके नीचे दबे शिल्प, मूर्तियों की स्थिति, कार्बन डेटिंग से जगह के इतिहास की रूपरेखा, वहाँ पहुंचकर सुगमता से कुछ दिन रहने के तरीके और स्थानीय कलाकारों, हस्तकलाओं की जानकारी। अपनी भाषायी सीमाओं में हिचक रहे करोड़ों भारतीय लोगों को नया संसार दिखाने में उसे अलग ही आनंद आता था। कमल की पहल देश के उन नगीनों को जनता व कॉर्पोरेट जगत के सामने ला रही थी जो पर्यटन की भेड़चाल में कहीं दब से गये थे। स्थानीय लोगों और सरकारें भी आय के लिए कई ऐसे स्थानों के विकास, उनसे जुडी धरोहरों को संजोने और इतिहास को खंगालने में सक्रीय हो गये थे। अब तक पर्यटन को मुख्यतः विदेशी पर्यटकों और तीर्थ यात्राओं से जोड़कर देखा जाता था। कमल के प्रयासों से भारत के कोने-कोने की गलियों, लोक-कलाओं और किवदंतियों की कद्र होने लगी थी।

मोहित शर्मा ‘ज़हन’

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