पिता की आस

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पिता की आस

By |2018-06-18T22:02:35+00:00June 18th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |1 Comment

कल तक जिनकी उँगली थामे चलना सीखा करती थी
कल तक जिनके बाहों में मैं झूला झूला करती थी
गुजरते उम्र और बढंते जिम्मेदारी ने
उन कंधो को आज झुका दिया है
जीवन के आगे के सफर केलिये
हमने उनको अपनी उँगली की जगह
एक कठोर लाठी थमा दिया है।

जब वो जवान थे और हम उनके गोदी की शान थे
हमारे बस एक फरियाद पर
वो अपने हर अरमान दबा दिया करते थे।
तब सीमित आय में खुद रहकर फटी बनियान में
वो हमें रंगीन कपड़ो से सजाया दिया करते थे।

हमें वो सब मिल सके जिसकी चाह हमारे दिल में है
अच्छे कपड़े, अच्छा खान-पान
बेहतर स्कूल और जीवन का श्रेष्ठ सोपान।
पापा ने तब केवल हम बच्चों केलिये सोचा
अपने शरीर और स्वास्थ्य तक के जरूरत को
हँस कर कर दिया हमारी जिम्मेदारी पर कुर्बान।

आज वो बीमार हैं, क्योंकि कल हमारे शौक पूरी हो
इसलिये उन्होंने अपना इलाज नहीं कराया था।
हमें खीर पसंद थी, इसलिये पापा ने अपनी सेहत केलिये
कब से दूध और दही लेने के अपने जरूरत को सुलाया था।
आज वो बहुत कमज़ोर हैं
क्योंकि कल उन्होंने अपने शरीर को ईंधन की तरह
अपनी संतान के ख्वाब सजाने केलिये जलाया था।

उनके खून और पसीने से संचित होकर
आज हम साहब कहलाते हैं ।
अच्छी नौकरी पायी, खुद का शानदार महल बनाया
और समाज में अपनी मजबूत पहचान पाते हैं ।
इस महल के नींव में पापा के घिसी हुयी हड्डियों का वजूद दवा है।
कल जो उन्होंने अपनी चाह दबायी थी उसी पूँजी से मेरा ये घर खरा है।

उनके पास जब बैठती हूँ तो
बचपने के हजार स्मृतियों से घिर जाती हूँ
दिल कहता है चल तोड़ दें पापा की निर्जीव लाठी को
और खुद उनका सहारा बन जाती हूँ।
लेकिन अब हम बड़े हो गये हैं
बचपन के निश्छलता से दूर निकल आये हैं।
पापा का सहरा बनना तो दूर
उनके पास बैठने तक का वक्त निकालने से बिफर जाती हूँ।

अब वो मेरे संगमरमर के
आलीशान महल के कोने में
वीरान से परे रहते हैं ।
सुविधा के नाम पर जो सामान दिये हैं उनको
उस सामान में वो प्राण खोजा करते है।
बचपन से निकल कर
जिम्मेदार हो चुके अपने संतान में
कंधे पर झूलते बचपन की
पहचान खोजा करते हैं।

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One Comment

  1. Sheetanshu Shekhar June 19, 2018 at 9:37 am

    Really nice and meaningful.

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