चलो! फिर से नन्हें बन जाये…

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चलो! फिर से नन्हें बन जाये…

चलो ! फिर से नन्हें बन जाये ,

अपने बचपन को फिर दोहराएँ .

गुज़रते वक़्त की गली में छोड़ा जिसे ,

उन यादों को  फिर से लौटा आयें .

क्या सुख पा लिया बड़े होकर हमने ?

आज बचपन की गलिओं की खाक छान आयें .

जाने कहाँ खो गयी वोह मासूमियत ,भोलापन,

अपनी उस निष्कपटता ,निश्छलता ढूंढ आयें .

उतार कर सर से तनाव, चिता, जिम्मेदारिओं का बोझ ,

कुछ पल के लिए सही ,बेफिक्री ओढ़  आयें .

फिर से खेलें गुड्डे -गुड़ियों का खेल , लुका-छिपी का खेल,

और  आसमान से कटी पतंग लूट आयें.

बहुत अरसा होगया  दादी-नानी के किस्से नहीं सुने ,

वोह तो  अब गुज़र चुके ,माँ की गोद में  ही सो रहें.

जबसे गया हमारा बचपन ,हमने कभी ज़िद भी न की ,

झूठ -मुठ तो  क्या !सच्ची में भी कभी नहीं रूठे ,

किससे रूठे ? किससे ज़िद करें ? कोई है अपना ?,

अब यह  पीड़ा , यह उलझन कैसे सुलझाएं ?

कई ज़मानो से कोई शरारत भी न की , न  ठिठोली ,

न कभी खुल कर हँसे ,कोई दीवाना न समझ ले इस डर से ,

मगर बहुत हो चूका यह डर ,यह संकोच ,

चलो ! आज सारा डर ,संकोच  कहीं दूर फेंक आयें.

बहुत जी लिया  नीरस,बोझिल बड़प्पन  हमने ,

चलो आज फिर  नन्हें  बन जाएँ.

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संक्षिप्त परिचय नाम -- सौ .ओनिका सेतिया "अनु' , शिक्षा -- स्नातकोत्तर विधा -- ग़ज़ल, कविता, मुक्तक , शेर , लघु-कथा , कहानी , भजन, गीत , लेख , परिचर्चा , आदि।

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