हिचकी

घड़ी दो घड़ी ठहरती है
बिन बुलाए आती है
बिन बताए चल देती है
कभी-कभी जान ले लेती है
राम-राम पुकारते चल दिए थे राजा दशरथ
हिचकी बहुत पीड़ा देती है
जैसे राजभवन में धरना
तुम अर्पण तर्पण विसर्जन सब करना
परंतु ,
मेरे बाद मुझे याद नहीं करना
हिचकी बहुत पीड़ा देती है ।

वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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