वज़्न– 2122-1212-2212
ग़ज़ल
राह काँटों भरी मिले चलना सदा।
प्यार हँसके सफ़र से ही करना सदा।।

धूप हो छाँव हो नहीं रुकना कभी।
आँख तू लक्ष्य पर लगा रखना सदा।।

आँधियाँ भी चलें तुफ़ां आएँ मगर।
पर्वतों-सा खड़ा अचल रहना सदा।।

काम वो जो मिसाल ही बनके रहे।
और तो हाथ का रहे मलना सदा।।

दूसरों को नहीं खुदी को सीख दो।
देख फिर और का बने ढ़लना सदा।।

यार तू याद रोज आता है बहुत।
ख़्वाब में ही सही मगर मिलना सदा।।

चूक जाए नहीं निशाना ये तेरा(तिरा)।
बाज बनके उड़ान तू भरना सदा।।

यार प्रीतम मज़े करो मिलजुल यहाँ।
टूटकर साख से न तू गिरना सदा।।

-राधेयश्याम बंगालिया “प्रीतम”

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