दोहे–प्रेरणा के दोहे
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1-
प्रीतम कर्म सदैव कर,जीवन का आधार।
कर बिन मानो दीन हैं,मानव गज सरकार।।
2-
प्रीतम हलुआ प्रेम का,खाते जाओ खूब।
जीवन है दिन चार का,व्यर्थ न जाए डूब।।
3-
प्रीतम भूला भोर का,संध्या आए लौट।
माफ़ी दे दो भूल की,करो कभी ना चोट।।
4-
प्रीतम चोरी छ़ोड़ दो,ये ना छिपती यार।
मुख है दर्पण साफ़ ये,दिखे दाँव सब हार।।
5-
प्रीतम दुनिया तेज़ है,समझो इसकी चाल।
वरना पीछे छूट के,बन ठन-ठन गोपाल।।
6-
प्रीतम सारे काम तुम,करना मन से मीत।
हार-हार कर रो पड़े,होगी तेरी जीत।।
7-
प्रीतम संकट सिर्फ़ ये,बंदर घुड़की यार।
आगे सीना तान बढ़,लेंगी सुबकी हार।।
8-
प्रीतम राही वो सुनो,जाता मंज़िल पार।
चाँद-सूर्य को देख लो,चलें बिना ये हार।।
9-
प्रीतम सबसे ऊँच है,शिक्षा सीढ़ी यार।
चढ़के इसपर जीत तू,सपनों का संसार।।
10-
प्रीतम आँधी प्रेम की,घृणा उड़ा ले जाय।
मन को करती साफ़ ये,सबके मन को भाय।।
11-
प्रीतम जीवन योग से,सदा रहे खुशहाल।
बहार आ ज्यों बाग में,फूलों सजती डाल।।
12-
प्रीतम आँसू आँख का,समान मोती मान।
व्यर्थ बहा ना रूठ के,कर ना तू नुकसान।।

राधेयश्याम बंगालिया “प्रीतम”
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