रिश्तों की अहमियत

Home » रिश्तों की अहमियत

रिश्तों की अहमियत

By |2018-06-25T20:17:10+00:00June 25th, 2018|Categories: आलेख|Tags: , |0 Comments

रिश्तों की अहमियत

आज हम सब हकीकत से ज्यादा दिखावे में विस्वास करते हैं। अपना ज्यादा से ज्यादा बहुमूल्य वक्त जो कि अपनो के साथ बिताना चाहिए अपनों के लिए देना चाहिए उसे अपनों की कमियों को खोजनें में गवां रहे हैं और फिर उन्ही से कहते हैं। कि आप बदल गए हो। ये कहाँ का न्याय है ये तो वही बात हुई “उल्टा चोर कोतवाल को डांटे”। हम किसी को न तो वक़्त देते हैं और न ही अपनी कमियों को देखते हैं इसके विपरीत सामने वाले को हर बात के दोसी ठहराते हैं। उस वक़्त हम भूल जाते हैं कि सामने वाले कि वजह से हमने कितनी खुशियां पाई हैं सामने वाले ने हमारी एक आवाज में अपना बहुमूल्य वक़्त दिया। जो हम उसे कभी वापस नहीं दे सकते । जब हम किसी अपने को नजरन्दाज करते हैं तो होने वाले दर्द को भूल जाते हैं कि ये चोट सीधे दिल पे लगती है और ऐसे दर्द को सामने वाला एक वक्त तक सह सकता है। रिस्ता कोई भी हो उसकी अहमियत को समझो।
जो रिस्ते भावनाओं और अहसासों से बंधे है उन्हें दिखावे की जरूरत न होती है दिल के रिश्तों को दिल से समझने और निभाने की कोशिश करो दिमाग से नहीं। कहीं ऐसा न हो जाये मैं (अहम) की लड़ाई में दिल, भावनाओं और अहसासों से बने रिस्ते हार जाएं। टूटते वक़्त तो रिस्ते की अहमियत क्या है समझ न आएगी, लेकिन जब कभी आप कामयाबी हासिल करोगे या कोई दूसरा शख्स आपका दिल दुखायेगा तो यही रिस्ता(बिछड़ा हुआ शख्स) सबसे ज्यादा याद आएगाऔर तब बहुत ही देर हो चुकी होगी। रिश्तों की जीत के लिए खुद का जितना जरूरी नही होता पर हमेशा हारना भी नहीं, इस हार जीत की लड़ाई में रिश्तों की अहमियत को कभी नहीं भूलना चाहिए। दिल और भावनाओं से बंधे रिस्ते का हमेशा जीतना जरूरी होता है। रिस्ते की जीत ही असली जीत है ।
रिश्तों में कडुआहट का होना तब सुरु होता है जब हम छोटी छोटी बातों को अपनी तौहीन या अपने आत्मसम्मान के विरुद्ध समझना सुरु कर देते है। तब हम ये भूल जाते हैं कि आत्मसम्मान तो सामने वाले का भी है। जो बात हमे नहीं प्रसन्द वो सामने वाले को कैसे प्रसन्द हो सकती है। आखिर इतने खुदगर्ज हम कैसे हो सकते है कि सिर्फ अपनी खुशी प्यारी है। अगर हम सामने वाले से कोई अपेक्षा या उम्मीदें रखते है तो उसे भी तो हमसे कुछ उम्मीदे होंगी। यदि ये समझ हम रखें तो ये लड़ाई की नौबत कभी न आएगी। एक दूसरे की जरूरतों और उम्मीदों को समझ के जो रिस्ते निभाये जाते हैं वही रिस्ते दूर बहुत दूर तक जाते हैं और दिल हमेशा ऐसे ही रिस्ते खोजता रहता है। जब एक दूसरे से लड़ाई होती है तब हम खुद कहते हैं ” हम एक दूसरे से इतना लड़ते हैं अब हम दोनों में प्यार नहीं रह गया फिर भी ये दिल को आपका ही इंतेज़ार रहता है आपको ही ये दिल खोजता है। “
आखिर क्यों ?
अगर वक़्त मिले खुद से बात करने का तो शांत मन से ये सवाल खुद से करना आपके जवाब खुद ब खुद मिल जाएंगे। किसी दूसरे की जरूरत न पड़ेगी। ऐसे ही रिश्तों जो अहसासों से भरे, भावनाओं से ओतप्रोत और दिल से जुड़े होते हैं। सही मायनों में यही सच्चे रिस्ते होते हैं बस जरूरत है तो थोड़ा समझने की।
अतः आप सबसे विनती है मेरी अपनों के लिए और अपने रिश्तों के लिए भी प्रतिदिन कुछ वक्त निकालो। आपके अलावा उनका कोई नही है अपनों की समस्याओं को समझो। खुशियां अपने आप मिल जाएंगी।

सुबोध उर्फ सुभाष

Say something
Rating: 4.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...

About the Author:

Leave A Comment