अक्सर मैं, जब एक कमरे में पढ़ने या लिखने बैठती हु।
तभी सहसा एक धुन सुनाई देती है।
वो ना किसी कोयल के गीत की धुन है, ना किसी प्रेमिका के गीत है।
जिन गीतों पर प्रेमी घायल है।
अरे वो तो मेरी माँ की छनकती पायल है।
मेरी कविता का शीर्षक है, मेरी माँ की छनकती पायल।

ये पायल सिर्फ मेरी माँ के पैरों की शोभा नही,
मेरी हितैषी है, और मेरी सहेली है।

अरे सच में यकीन करो
ये माँ के पैरों की छंछनाती पायल ही मेरी सहेली है।

अक्सर जब मै अपने कमरे में होती हु।
तब माँ मुझे नीचे रसोई मै, जाने से पहले मुझे कहती है।
चुपचाप पढ़ना , फ़ोन ना चलाना।

पर मेरा दिल भी तो नादाँन
सखियन से करने को बात।
चला जाता फ़ोन के पास।

तभी अचानक ,
माँ तो ,मुझे पकड़ ही लेती।
पर माँ की पायल तो मेरी सहेली है ना,
भला ,वो मुझे कैसे पकडे जाने देती।
सच में यकीन करो !
मेरा हितैषी, कोई ग़ज़लों का शायर नही है।
जो अपनी शायरियों का कायल है।
अरे हाँ, हाँ…………
ये तो मेरी माँ की छनकती पायल है।
रात में जब में नींद में होती हु।
और मेरी अलसाई आँखे हल्के से खुल जाती है,
तब भी माँ की पायल मुझे बता देती है, माँ अभी जाग रही होगी, या सो रही होगी।
या माँ अभी किस कमरे में होगी।

जब मै घर पर होती हु, और माँ बाहर से आती है।
तब भी ये पायल मुझे बता देती है, माँ किस दिशा से आएगी, और किस दिशा में होगी।

सच में मेरी माँ की पायल , है,
मेरे माँ के लिए अद्धभुत पहेली
और मेरे लिए ,मेरी प्यारी सहेली ।

अरे पैरो के इस आभूषण पर तो
माँ लक्ष्मी तक मुस्काई थी।

तो मधुमालती भी शरमाई थी।
वही , एक और इस पायल को पहन, भगवांन विष्णु भी बन मोहिनी इठलाई थी।

जिस धुन से मिलती मुझे ख़ुशी है, जिस धुन पर मेरा तन मन दोनों घायल है।
ये और कोई धुन नही ,मेरी माँ की छनकती पायल है।

मेरी माँ के पायल की घुंघरुओं की बात ही निराली है।
ऐसा लगता है,,,,,,,,,,

चांदी की टहनियों पर सजी चंपा के फूलों की क्यारी है।

उन घुंघरुओं से धुन और गीत की साज़ निकलती है।
मानो माँ सरस्वती के मुख से उन्ही की, वीणा की मधुर आवाज निकलती है।
अरे इस मधुर धुन पर तो ,मेरा सर्वस्व कायल है।

ये और कोई धुन नही,
“मेरी माँ की छनकती पायल है।”

– ममता

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