सीखभरे दोहे

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सीखभरे दोहे

**दोहे**

प्रीतम इच्छा मार तू,पूरी ये ना होय।
सागर पानी से भरा,प्यासा रखता तोय।।

प्रीतम धोखा जाल जग,छलते जाते हार।
स्वर्ण-हिरण की चाह में,रामा खाए खार।।

प्रीतम घर का नाश है,भूल नशे की बात।
दीमक खाए काट को,खाता यूँ ही गात।।

प्रीतम जैसी चाह है,साथी वैसे राख।
धारण उनके होय गुण,सफ़र मिले साख।।

प्रीतम ऊँचा होय के,भूल नहीं औक़ात।
कितना लम्बा होय दिन,होती है पर रात।।

प्रीतम चाहत फूल-सी,भूलो ना ये बात।
चकोर चाहे चाँद को,सोचे आए रात।।

प्रीतम मिलिए प्यार से,तनाव जाए भाग।
भ्रमर फूल को देख ज्यों,छेड़े अपना राग।।

प्रीतम रहिए शौक़ से,रहना है दिन चार।
लेकर आए मौन पल,मौत का समाचार।।

प्रीतम छोड़ो आग तुम,आग नहीं है ठीक।
लोह गला दे पाश ले,नाश जड़ा ये लीक।।

प्रीतम मुखिया भार पद,बड़ी चुनौती होय।

मालिक से ख़ुश ना सभी,मानव से क्या होय।।

राधेयश्याम बंगालिया “प्रीतम”
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राधेयश्याम प्रीतम पिता का नाम श्री रामकुमार, माता का नाम श्री मती किताबो देवी जन्म स्थान जमालपुर, ज़िला भिवानी(हरियाणा)

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