। । त्रास । ।

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। । त्रास । ।

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। । त्रास । ।

सड़कें खेतों को खा गईं
रसोई खाया हास
कैसे कहें किससे कहें
खाया कौन विश्वास

सड़कें खेतों को खा गईं . . .

मन रे गा तू खोद गढ़ा
भरकर फिर से खोद
मीठी छुरी चलाए यूँ
लुटने का न हो आभास

मन रे गा तू खोद गढ़ा . . .

घर – आंगन हगना – मूतना
बाहर दोष महान
युगों – युगों की मूढ़ता रे,
युगों का अब उपहास

घर – आंगन हगना – मूतना . . .

कहाँ जलाएं दीप हम
कहाँ बिछाएं नैन
न्याय – तुला निज हाथ रहे
होवे निज आवास

कहाँ जलाएं दीप हम . . .

सपनों का नगर बस रहा
खाकर गाँव हज़ार
धर्म – संस्कृति – प्रेम को
मिला आजीवन वनवास

सपनों का नगर बस रहा . . .

वणिक – वेश में दस्युदल
आ रहे यूँ छा रहे
पीछे लूटें संपदा
पहले फोड़ें इतिहास

वणिक – वेश में दस्युदल . . .

अंधियारा युग यूँ बीता
रह – रहकर उठती टीस
नई सुबह सूरज नया
रह – रहकर देता त्रास

अंधियारा युग यूँ बीता . . .

अपना मारे छाँव धरे
यही सुनी है रीत
छाँव में पाँव जल उठें
कह दे, जाएं किसके पास

अपना मारे छाँव धरे . . .

जग में डंका बज रहा
हो रही जय – जयकार
रोटी बिन बातें सब खोटी
खोटा सब विकास

जग में डंका बज रहा . . .

आँख टिकी है तुझी पर
तुझसे ही है आस
तू ही आँखें फेर ले
कैसे बुझे फिर प्यास

रे सजना ! कैसे बुझे फिर प्यास . . . ?

वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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