ऋतुएं एवं आहार

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ऋतुएं एवं आहार

By |2018-07-03T06:45:27+00:00July 3rd, 2018|Categories: स्वास्थ्य|Tags: , , |0 Comments

आओ जानें वार्षिक ऋतुएं—–
चैत्र मास से शुरु संवत् का।
फाल्गुन माह अंत संवत् का।।१

बारह मास छः ऋतुऐं पड़ती।
सर्दी गर्मी बारिश हैं करतीं।।२
( दो दो महीने की छः ऋतुयें, चार महीने के तीन मौसम।दो महीने के मुख्य व दो महीने संधिकाल, इस तरह चार माह का एक मौसम)

ऋतु बंसत ऋतुओं का राजा।
प्रमुदित तनमन सकल समाजा।।३
(ऋतुराज, गुलाबी ठंड, प्यार का मौसम )

बीता फाग चैत्र फिर आये।
गर्मी का अहसास कराये।।४
( तपती गर्मी की शुरुआत, कीटाणु भी समाप्त )

ग्रीष्म बीत बारिश ऋतु आती।
धरती का श्रृंगार कराती।।५
( हरियाली का पिकनिक का मौसम, संत महात्माओं का चतुर्मास प्रारंभ )

बारिश बीत शरद ऋतु आई।
पुलकित मन त्यौहार है लाई।।६
(त्यौहार के साथ बीमारी भी, कीटाणुओं का प्रकोप )

शरद बीत हेमंत ऋतु आई।
तनमन में विश्वास जगाये।।७
( सेहतमंद मौसम,अच्छा खाइये और वर्षभर के लिए सेहतमंद हो जाइए। अगर अब भी स्वास्थ्य नहीं बनता तो फिर मुश्किल है। )

जा हेमंत शीत ऋतु का आना।
सर्दी सर्दी सब चिल्लाना।।८
(चिल्ला जाड़े, भयंकर सर्दी, मकर संक्रांति इसी मौसम में आती है। सूखेमेवे, तिल, गुड़ आदि पौष्टिक आहार का सेवन व दान पुण्य भी करें।)

बत्तीस माह सोलह दिन में।
अधिक माह पड़ता संवत् में।।९
पुरुषोत्तम अधिक मास कहाता।
व्रत कोकिला इसी में है आता।।१०
(पुरुषोत्तम मास हर तीसरे वर्ष आता है। इसमें हर महीने पड़ने वाली संक्रांति नहीं होती है। पूजा, पाठ, अनुष्ठानों का महत्व होता है।)

मौसम के अनुसार खानपान————-
पुराने समय में हमारे बुजुर्ग, वैद्य, आयुर्वेदाचार्यों ने खानपान को लेकर मौसम के अनुसार आहार की सलाह दी है। इससे बिना दवाओं के भी बीमारियो से बचकर ,स्वस्थ रहा जा सकता है। और यह घर घर में बुजुर्गों द्वारा समझाया जाता था।आजकल एकल परिवारों में ये जानकारियां देने वाला कोई नहीं है ,इसीलिये शायद हर छोटी मोती बीमारियो में भी चिकित्सक के यहाँ भागना पड़ता है।
किस ऋतु में क्या खाया जाय और क्या नहीं,यह सब बड़ी ही सरलता से इन लोकोक्तियों द्वारा बताया गया है। क्या नहीं खाएं व क्या नहीं खाएं।

चैत्रे गुड़ न , वैशाखे तेल
ज्येष्ठ महुआ , आषाढ़े बेल
सावन साग न ,भादों मही(छाछ)
क्वार करेला ,कार्तिक दही
अगहन जीरा,पूस (पौष)घना
माघ में मिश्री ,फाल्गुन चना
इन नियमों को जो माने नहीं,
मरे नहीं तो ,परे (रोगी होना) सही।
अर्थात इन महिनों में जहां तक हो उपरोक्त चीजों को खाने से बचना चाहिए। इसी प्रकार मौसम के अनुसार लाभप्रद भोज्य पदार्थ खाने की भी आयर्वेदाचार्यों ने सलाह दी है , क्या खाना चाहिए———-
चैत्र माह में नीम पत्ती हर दिन खाय ,
ज्वर,डेंगू,मलेरिया,बारह मील भगाय।
चैत्र आंवला कच्चा चबाय
ताहे रोग कबहुँ न सताय।
वैशाखे जो खाये करेला,
ज्येष्ठ दाख ,आषाढ़े केला।
सावन निशि(रात्रि) जब तब खाय,
भादों ब्यारु (शाम का भोजन) कबहुँ न खाय,
क्वार कामना दे बचाय, तो शत बरस की आयु पाय।
भादों की छाछ भूतों की,कार्तिक की छाछ पूतों की।।

चैत्र माह में गुड़ बिल्कुल नहीं, नीम की पत्ती/फल, फूल खूब खाएं।
वैशाख में नया तेल नहीं, चावल खूब खाएं।
ज्येष्ठ में तीखी धूप दोपहर में, बाहर नहीं घूमें, दोपहर में थोड़ा सोएं अवश्य।
आषाढ़ में पका बेल फल खाना निषिद्ध है।
सावन में साग (हरे पत्तेदार सब्जियां) खाना नहीं चाहिए, हरड़ अवश्य लें।
भादों माह में दही नहीं, चना अवश्य खाएं।
क्वार में करेला नहीं, गुड़ अवश्य खाएं।
कार्तिक माह में जमीन पर नहीं सोएं, मूली अवश्य लें।
पौष माह में धनिया नहीं, दूध अवश्य लें।
माघ माह में मिश्री नहीं, खिचड़ी अच्छी (जरूरी) है।
फाल्गुन में चने का सेवन नहीं, प्रातः स्नान एवं नाश्ता अवश्य करें।

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