ना जाने.क्यों

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ना जाने.क्यों

By |2018-07-05T20:55:05+00:00July 5th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

एक प्रयास़..

न जाने क्यूँ कुछ अच्छा नही लगता
सब सच है पर कुछ सच्चा नही लगता

बदलते देखा अपनो को पर
कुछ देखा नही लगता

भरोसा तोड़ा अपनो ने
पर कुछ टूटा नही लगता

रूठ गयी हमसे हर खुशी
पर कुछ रूठा नही लगता

मर गयी हर भावना
पर कुछ मरा नही लगता

गलत हुआ सब कुछ
पर कुछ गलत नही लगता

जिन्दा है सब कुछ
पर कुछ जिन्दा नही लगता

अंत हुआ हर सपने का
पर यहीं कुछ प्रारंभ है लगता

 -प्रीति चौधरी

 

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