सब जान जाएंगे

सब जान जाएंगे

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सब जान जाएंगे

मृत्यु को भी मृत्यु का भय रहा
जब तक तेरे हाथों खङ्ग रहा
इक-इक अक्षर सत्य रहा
जो-जो था तूने माँ से कहा
तेरी कथा वो सब कह देगी
मंदिर में जलती दीपशिखा

श्वान-श्रृगाल मरे-भगे कैसे
सब जान जाएंगे . . . . .

रणभूमि का रक्तिम रंग हुआ
दुर्जन इक-इक कटकर गिरा
ग्रीवा से असि का संग हुआ
विकल टिड्डीदल हर अंग हुआ
पीठ पीछे इक दानव जा पहुंचा
हा ! वीर से कैसा छल हुआ

भूलुंठित खंग हुआ कैसे
सब जान जाएंगे . . . . .

शत्रुदल रुई जैसा धुना
नर-नाहर वीरता-धर्म चुना
“आओ रण में !” सबने सुना
चूहा बिल में बाहर झुनझुना
अंधे-बहरे सब काँप गए
बिके हुओं ने जाल बुना

प्रस्तर-मेंह बरसा कैसे
सब जान जाएंगे . . . . .

नोचा-खोंचा बोया-बीना नहीं
रंग धरती का वापस दीना नहीं
धर्म-प्राण-प्रेम क्या कुछ छीना नहीं
वहाँ अब कोई पर्दा झीना नहीं
विषधर डोल रहे यूँ बोल रहे
मुझसा न जियो तो जीना नहीं

हवाएं हरी हुईं कैसे
सब जान जाएंगे . . . . .

प्राण हथेली जिनके नीड़ कहाँ
घाव कहाँ और पीड़ कहाँ
गमलों में उगता चीड़ कहाँ
छाती तो है पर रीढ़ कहाँ
प्रधानसेवक गरज रहा
सभासदों की भीड़ कहाँ

जीती बाज़ी हारे कैसे
सब जान जाएंगे . . . . .

नाथों के नाथ हे अमरनाथ
बौनों ने बीजी विषैली घास
कुदाल-लेखनी मेरे हाथ
स्वेदकणों से बुझती प्यास
काली सदियों में अल्प समय शेष
हे त्रिनेत्र जग में भरो उजास

तांडव कब-कब हुआ कैसे
सब जान जाएंगे . . . . . !

वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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