तू रूठे न बस हमसे

हमसे जाके दूर तू,भूल न जाना यार।
ज़रूर करना फ़ोन तू,रोज एक दो बार।।
रोज एक दो बार,प्यार रहे सदा ताज़ा।
सुख-दुख होते रहें,साँझा सदैव लिहाज़ा।
सुन प्रीतम की बात,दूर रहो यार ग़म से।
दुवा मालिक से है,तू रूठे न बस हमसे।

समझिएगा पर पीड़ा

पीड़ा देती दर्द पर,देती है ये सीख।
न्यारा-प्यारा कौन है,जाता है ये दीख।
जाता है ये दीख,प्रेरणा इसे समझिए।
संकट पल चार का,हँसके इससे निपटिए।
सुन प्रीतम की बात,दिमाग़ का मरे कीड़ा।
सुख में चाहे न मिल,समझिएगा पर पीड़ा।

 

करो तुम ऐसी दोस्ती

 

दोस्ती करके रात की,सुबह गया वो रूठ।

लम्हा-लम्हा प्यार था,उसका सफ़ेद झूठ।।

उसका सफ़ेद झूठ,रुलाके नहीं हँसेगा।

मेरी तरह वो भी,धोखे में ही फँसेगा।

सुन प्रीतम की बात,मिटती सभी की हस्ती।

प्राण जाए वचन न,करो तुम ऐसी दोस्ती।

 

 -राधेयश्याम बंगालिया “प्रीतम”

 

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