प्रेम, द हीलिंग पॉवर

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प्रेम, द हीलिंग पॉवर

‘कहीं बेवजह न गुजरे ये जिंदगी’

प्रेम,प्रेम,प्रेम और सिर्फ प्रेम!!!!
उम्र धीरे धीरे धीरे यूँ ही खिसकता जा रही है। पल प्रतिपल कब मिनट, घण्टों, दिनों, महीनों और सालों में गुजर गए पता ही नहीं चला। आज मुड़ कर देखें तो लगता है क्या यही जिंदगी है? खाना, पकाना, कमाना और सो जाना।फिर एक नई सुबह,फिर वही दिनचर्या । आखिर तो जिंदगी का भी कोई तो उद्देश्य होना चाहिए। ईश्वर ने हमें ऐसे ही तो नहीं बनाया होगा। #पशुवत जीवन भी कोई जीवन है। जीवन मे बड़े बड़े दावे, मैं समाज में प्यारभरी दुनिया का निर्माण कर समाज में परिवर्तन लाऊंगा, लेकिन सच तो ये है, ये सब दिखावे की बातें हैं। प्रथम तो हम स्वयं से प्यार करें। #स्वयं से #प्रेम करना एक #चमत्कारिक इलाज है। अगर हम स्वयं से प्यार नहीं कर सकते तो हम दूसरों से कैसे अपेक्षा रख सकते हैं कि वह हमें प्यार करे। हम दूसरों से भी सच्चा प्यार नहीं कर सकते। हम दूसरों को भी सच्चा प्यार तभी दे सकते हैं, जब हमारे पास देने लायक प्यार हो। आध्यात्मिक दृष्टि से भी कहते हैं, आत्मा सो परमात्मा। जब आप स्वयं से प्यार करोगे मतलब आप ईश्वर से प्रेम करोगे। जब आप स्वयं से प्यार करेंगे तो जानेंगे , मैं कौन हूं।और अपने अंदर पाएंगे एक अति सुंदर, सर्वशक्ति से भरपूर, सर्व आंनद आत्मविश्वास से भरे हुए व्यक्ति को। ओर यह व्यक्ति जोश से लबरेज होगा, उसके अंदर जुनून की सारी हदों को पार करने की क्षमता उमड़ रही होगी। पाने की तीव्रता ही उसे अपने परम तक पहुंचा सकती है।अक्सर हम प्रथम दूसरों को प्यार करते हैं और सोचते हैं कि हमें इसकी जरूरत नहीं। लेकिन जब आप #प्यार से #परिपूर्ण नहीं होंगे तो किसी दूसरे को देंगे क्या।
आजकल जो प्रेम की परिभाषा व्यक्त होती है, वह प्रेम नहीं है। वो तो कई बार देखने में मात्र व्यापार से लगता है। एक दूसरे की जरूरतों का ध्यान रखो ,या फिर अधिकार की भावना।प्रेम तो त्याग सिखाता है। प्रेम तो वह मंत्र है, जिसमें व्यक्ति स्वयं को भूल जाये। तू तू ना रहे, मैं मैं ना रहूँ बस एक दूजे में एक हो जाएं। सूफी परम्परा में भी ईश्वर को हमेशा प्रेमी रूप में ही देखा गया है। और ईश्वर का दरवाजा केवल उन लोगों के लिए खुलता है, जो स्वयं को खो चुके हैं, भुला चुके हैं। उनके लिए सर्व जगत, प्रकृति, जीवजन्तु सबमें एक ही का निवास है।
एक शोध के मुताबिक प्यार भी रासायनिक प्रक्रिया से बंधा हुआ है। जब हम् प्यार देते हैं तथा हमें प्यार मिलता है तो मष्तिष्क से #लव हार्मोन्स (ऑक्सीटोसिन) प्रवाहित होते हैं, जो हमें #तनाव से बचाते हैं, हृदय को सुरक्षित रखने में सहायक है, तथा एक आपसी बॉन्डिंग (#विश्वास) बनता है। आपके अवचेतन मन में स्वयं से प्यार करने की प्रक्रिया से स्वयं को heal करने में मदद मिलती है।जब हम स्वयं की केयर करते हैं तो दूसरों की करने में भी समर्थ होते हैं। स्वयं से प्यार करने की योग्यता हमारी शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आपसी संबंधों को enhance करती है। स्वयं से प्यार अपनी इच्छाशक्ति को दृढ़ता प्रदान करता है। इसलिए स्वयं से प्यार करना सीखिए। इसका अभिप्राय स्वार्थी होना तो कदापि नहीं है। love is the core of all healing.स्वयं से प्यार अभिव्यक्ति सिखाता है, बिना किसी स्वार्थ, शर्त हमें पोषण करने के लिए तत्पर कर सहयोगी बनाता है। इसमें ईगो (अहं) को दरकिनार करते हुए, गलतियों को स्वीकार करना सीखें। जब हम स्वयं से प्यार नहीं करते हमारा शरीर #कष्ट पाता है। किसी #बीमारी से भी घिर जाता है, या यों कहें वह तनाव में रहता है तथा #खुश नहीं हो पाता।
Loving ourselves works miracles in our lives.
Louise Hay (लुइस हे)
I accept love and appreciate myself as I am. इसे रोजाना कई बार दोहराएं। amazing.
#प्रेम एक सुंदर अहसास है। प्रेम करना या होना मनुष्य का #स्वभाव है। किसी भी चीज या व्यक्ति से जब मानसिक तरंगें मिल जाती हैं, तो प्रेम होता है। कभी संस्कार, कभी अतृप्त इच्छाओं की वजह से (पूर्वजन्म) भी सम्बंध होते हैं। ऐसा कई बार देखने में आता है कि कोई व्यक्ति अनजान होते हुए भी हमें बहुत ही अपना सा क्यों लगता है। शायद ये कोई मानसिक तरंगें ही होती हैं।

– मनु वशिष्ठ

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One Comment

  1. SUBODH PATEL July 6, 2018 at 1:39 pm

    सुपर

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