अहमियत रिश्तों की

अहमियत रिश्तों की

By |2018-07-07T04:46:14+00:00July 7th, 2018|Categories: आलेख|0 Comments

अहमियत रिश्तों की

कितने हँसी वो पल होते हैं जब कोई अपना पास और साथ होता है। न दर्द, न उलझनें पास होती है कोई एक रिस्ता ऐसा होता है। जिसके होने मात्र से सारे दुख खुशी में बदल जाते हैं ऐसा रिस्ता जो अहसासों और भावनाओं से बंधा होता है और विस्वास की कसौटी पर टिका होता है। ऐसे रिश्तों में अटूट विस्वास ही इस रिस्ते की मजबूती होती है जिसमें हम अपने लिए नही सामने वाले की खुशियों के लिए या उसके हिसाब से जीते है ये रिस्ते दूर बहुत दूर तक साथ निभाते हैं ऐसे रिस्ते के बीच कभी भी केवल अपनी खुशी को ही तवज्जो नहीं देना चाहिए।
गर कोई आपकी खुशी के लिए अपनी खुशियों को अपने मन को और अपने दिल की इच्छाओं को मार के आपको खुशियां देता है या आपको खुश रखने की कोशिश करता है तो उसे समझने की कोशिश करो। इससे पहले की देर हो जाये। उसके रिस्ते की, भावनाओं की और अपनी ज़िंदगी में उसकी अहमियत का अंदाजा लगाने की कोशिश करो। दुख का अहसास तो अकेले किया जा सकता है पर रो नहीं सकते। उसी तरह खुशियों का अहसास तो कर सकते हैं पर खुशी से हस नही सकते। कितनी भी खुशियां हों गर अपना कोई साथ न हो तो उन खुशियों का कोई मोल नही होता।
रिस्ते कम हो पर मजबूत हों और ऐसे रिश्तों को कभी नजरअंदाज नहीं करना । क्योंकि जो रिस्ते अहसासों से बंधे होते है। वो रिस्ता सौ रिश्तों पे भी भारी पड़ता है ज़िन्दगी को खुशियों से भरने के लिए ऐसा एक रिस्ता ही सौ रिश्तों के बराबर है। गर ये रिस्ते टूट गए तो ज़िन्दगी भर सताते है। चाहे खुशी हो या गम हरपल ऐसे रिस्ते जरूर याद आते हैं।
ये सच है रिस्ता जोड़ना बहुत आसान है उससे भी कहीं ज्यादा आसान है रिस्ता तोड़ना, बस मुश्किल है तो रिस्ता निभाना। इस बात के कोई मायने नहीं कि हमने कितने और कितने लोगों से रिस्ते जोड़े, हाँ इस बात के मायने जरूर हैं कि हम कितने दिनों तक एक रिस्ते में साथ रहे। कहते हैं किसी का पहला प्यार बन जाना कोई बडी बात नहीं, बड़ी बात तो तब है जब आपके बाद उसे किसी दूसरे से उस रिस्ते जरूरत ही न रहे। सही मायनों में किसी भी रिस्ते में आखिरी वक्त तक साथ बने रहना बड़ी बात है। पर दुःख तो इस बात का है कि आज लोग रिश्तों से ज्यादा जरूरतों को अहमियत देते हैं जरूरत है तो रिस्ते को याद करते हैं जरूरत पूरी हुई कि रिस्ता ही भूल गए। इसीलिए कोई भी रिस्ता कब और कहाँ टूट जाये कह नही सकते और दोष सामने वाले को देते हैं कि तुम मुझे समझते नहीं। ऐसा क्यों ?
यदि कोई आपसे दिल से जुड़ा है तो उसे दिल से अहमियत दो दिमाग से नहीं। सामने वाली की खुशियों के बारे में सोंचो। उसे खुश रखने की कोशिश करो। अगर दोनों तरफ से यही सोच मिल जाती है तो खुशियां अपने आप मिलने लगती हैं। खुशियाँ खोजने से नहीं मिलती हैं । मेरे ख्याल से खुशबू और खुशियाँ एक जैसी ही होती हैं। इन दोनों का असर पाने वाले और देने वाले दोनों की तरफ दिखता है। जिस तरह से इत्र बेचने वाला कितनी भी कोशिश कर ले कुछ महक तो उसके हाथ में जरूर रह जायेगी। उसी तरह अगर हमारी वजह से किसी को एक पल की भी खुशी मिलती है तो जरूर कहीं न कहीं किसी तरह से उस खुशी का अहसास हमें जरूर मिलेगा। कितनी भी नफ़रतें अपनी जड़ मजबूत कर लें। पर ये दुनिया तो तो सिर्फ प्यार और विश्वास से ही चलती है। जब तक दुनिया है प्यार और विश्वास नहीं खत्म हो सकता।
आज लोगों ने कितनी भी तरक्की कर ली हो पर ज़िन्दगी में खुशियों का सिर्फ एक ही हल है और वो है “माफी”। सामने वाले से कभी माफी मांग लेना और कभी माफ कर देना। माफी ही एक विकल्प है जो रिश्तों को मजबूती से बांध सकता है। और एक बात माफी मांग लेने से ये साबित नही होता कि सामने वाला गलत है पर ये जरूर साबित होता है कि माफी मांगने वाले को रिस्ते की अहमियत कितनी है। ठीक उसी तरह जिस तरह फलदार बृक्ष की डालों का झुका होना।

Write by
M S PATEL

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